पिता की परछाई – Family Values


दीना नाथ जी हीरो के बहुत प्रसिद्ध कारीगर थे। उनके हाथों में करिश्मा था की उनके तराशे हुए हीरे जो भी देखता हैरान हो जाता। ऐसी कारीगरी देख ग्राहक भी मुँह मांगी रकम देने को तैयार हो जाते और सुनार को मोटा मुनाफा मिलता। 
 

इसी वजह से दीना नाथ द्वारा तराशे हुए हीरों की माँग हमेशा बाजार में बनी रहती थी। वो सुनारों से हीरा ले आते और अपने घर बैठ कर उस को तराश कर सुनार को वापिस दे देते। 
 

उनका बेटा, सुरेश, अभी स्कूल में पढता था। लेकिन जब भी दीना नाथ हीरों को तराशा करते तो वह उन्हें बहुत ही ध्यान से देखता। उसकी उत्सुकता और हीरों के प्रति लगाव देख वो उसे भी अपने हुनर की बारीकियाँ समझाने लगे। कभी कभी तो वो उसे एक छोटा सा हीरा दे देते और कहते कि जैसा मैंने समझाया उसी तरह से तुम भी तराश के दिखाओ। और सुरेश बहुत लगन से हीरा तराशता। 
 

जैसे जैसे वक़्त बीतता गया उनका सुरेश भी अच्छा कारीगर बन गया और दीना नाथ जी बहुत खुश थे। अब वो सुनारों से ज्यादा हीरे लाते और दोनों बाप बेटा मिल कर उनको तराशते। लेकिन अब तक उन्होंने सुनारों को अपने बेटे की कार्यकुशलता के बारे में नहीं बताया था। 
 

एक दिन अचानक दिल का दौरा पड़ने से दीना नाथ जी की मौत हो गयी। बेटा गम में डूब गया, उसे पिता की मौत का सदमा इतना गहरा लगा कि वो हर वक़्त दीवार पर टंगी अपने पिता की तस्वीर को ही निहारता रहता। 
 

जब से दीना नाथ जी का देहांत हुआ था तब से घर में कमाई का एक पैसा भी नहीं आया था। घर में दाल रोटी ख़तम होने की नौबत आ गयी थी। तब माँ ने उसे सुनारों के पास जा कुछ काम माँगने को कहा ताकि घर का खर्चा तो चल सके। और कोई चारा न देख उसने अपने को सँभाला और बाजार निकल पड़ा। 
 

दीना नाथ के चले जाने के बाद सुनारों ने हीरों की तराशी का काम दूसरे कारीगरों को देना शुरू कर दिया था। कुछ सुनारों ने तो सीधा यह कह कर टाल दिया कि जब काम होगा बुला लेंगे। और कुछ ने अभी कोई काम नहीं है कह कर उसे चलता किया। 
 

थक हार कर बेचारा घर वापिस आ गया। घर के हालात अच्छे ना होने की वजह से उसने कहीं नौकरी करने की भी सोची। लेकिन फिर ये सोच कि उसे तो हीरों के अलावा कुछ आता ही नहीं वो मायूस हो गया। 
 

कुछ दिन ही बीते थे कि एक दिन एक आदमी उनके घर आया। उसे मालूम ही नहीं था कि दीना नाथ का तो देहांत हो गया था। ये सुन उसे बहुत दुःख हुआ और वो जब चलने को हुआ तो सुरेश ने पुछा, क्या कोई काम था। तब उस आदमी ने बताया कि वो पास के शहर में सुनार है और अक्सर दीना नाथ से अपने हीरों का काम करवाता था। ये सुन सुरेश ने उसे आग्रह किया कि वो एक हीरे का काम उससे करवा के देखे। सुरेश ने उसे ये भी बताया कि अपने पिता से पूरी कारीगरी उसने सीखी है। ये बात उस सुनार को ठीक लगी और उसने सिर्फ एक हीरा सुरेश को दिया और कहा कि इसे तराश कर कल मुझे दुकान पर दे जाना।  
 

अपने पिता को प्रणाम कर सुरेश काम में जुट गया। सारी रात लगा उसने उस हीरे को तराशा और सुबह उस सुनार के पास पहुंचा। 

उस हीरे को देखते हुए उस सुनार के मुँह से सिर्फ एक ही बात निकली, कौन कहता है दीना नाथ जी नहीं रहे। दीना नाथ तो मेरे सामने खड़े हैं सुरेश के रूप में। यह तो अपने पिता की ही परछाई है। ये सुन सुरेश की आँखों में आँसू आ गए। 
 

ये कहानी हमें यह बतलाती है कि अपने हुनर को पहचानो। जीवन में आगे बढ़ने के लिए परिश्रम करो और अपने काम को लगन से करो, तभी सफलता तुम्हारे कदम चूमेंगी। 

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