रोहित ने चोर पकड़ा – Social Responsibility

 

रोहित ने चोर पकड़ा

रोहित जब घर पहुँचा तो देखा कि बाहर खड़े टेम्पो में काफी सामान लदा था, सोफा, फ्रिज, टीवी, कपड़े और ना जाने क्या क्या। उसने सोचा शायद कोई नया किराएदार आ रहा है या कोई पुराना घर खाली कर रहा है। 

 

 

तभी एक अनजान आदमी 2-3 मजदूरों के साथ कुछ और सामान ले कर सीड़ियों से उतर रहा था। उस आदमी को पहले कभी बिल्डिंग में देखा नहीं था तो पूछ लिया ” कौन घर खाली कर रहा है।”
 
” अरे नहीं बेटा, कोई खाली नहीं कर रहा। मिश्रा जी घर का रेनोवेशन (Renovation) करवा रहे हैं, सो सारा सामान उन्होंने बेच दिया है।”
 
मिश्रा जी उप्पर तीसरे माले पर रहते थे। दोनों पति पत्नी नौकरी करते थे और सुबह ही घर से निकल जाते और फिर देर रात ही घर लौटते थे। सो कभी इतवार के दिन ऊपर नीचे जाते हुए मुलाक़ात होती और वो भी सिर्फ “हेलो, आप कैसे है” तक ही सीमित थी। 
 
हमारी बिल्डिंग में जितने भी परिवार रहते हैं, शायद ही कोई इससे ज्यादा एक दुसरे को जानता है। यही कारण है कि चौकीदार रखने की बात का मसला कभी हल नहीं हुआ। 
 
रात के 9 बज चुके थे और हम सब खाना खाने बैठे ही थे कि ऊपर के माले से जोर जोर से बातें करने की आवाजें आने लगी। क्या हो रहा है देखने के लिए बाहर निकला ही था कि सामने मिश्रा जी ऊपर से उतर रहे थे, साथ में बिल्डिंग के कुछ और लोग भी थे। काफी परेशान से दिख रहे थे और उनका चेहरा देख लग रहा था कि अभी रो देंगे। उनको इस हालत में देख मैंने उनका बाजू पकड़ कर पुछा ” क्या हुआ मिश्रा जी, आप इतने बदहवास से क्यों लग रहे हैं।” 
 
” रोहित जी, आज दिन में किसी ने हमारा घर लूट लिया है। चोरों ने कुछ भी नहीं छोड़ा।”
” चोरी, पर वो तो कह रहा था कि आपने अपना सामान उसको बेच दिया है।”
” बेच दिया, पर किसको? आप जानते है चोर को ?” यह सुन मैंने सारी बात मिश्रा जी को बता दी। वो भी सुन दंग रह गए और बोले 
” मैंने तो किसी को भी सामान बेचने या लाने को नहीं भेजा।” 
 
खैर, हम 2 -3 लोग मिश्रा जी के साथ पुलिस स्टेशन गए और चोरी की रिपोर्ट लिखवा दी। इंस्पेक्टर ने मुझसे भी पूरी पूछताश की। चोरों का और टेम्पो का हुलिया भी मैंने बता दिया। उन्हें ये भी बताया की टेम्पो के पीछे एक फोटो पेंट की हुई थी जिसमे शिवजी का त्रिशूल और डमरु बने हुए थे। पुलिस वाले हमारे साथ आए और मिश्रा जी के घर में छानबीन कर चले गए। जाते हुए इंस्पेक्टर ने हमें एक चौकीदार रखने की नसीहत भी दी, और ये भी बताया की इस तरह के गैंग अक्सर उन घरों को निशाना बनाते हैं जहाँ पति पत्नी दोनों नौकरी करते हैं।
 
लेकिन आज एक साल होने को है पर जब भी किसी से चौकीदार रखने की बात करो तो कोई ना कोई बहाना बना टाल देता है। 
 
उस चोरी के अभी 3 महीने भी नहीं गुजरें होंगे जब एक दिन मैं अपनी मोटरसाइकिल पर जाते हुए एक रेड लाइट पर रुका। सामने देखा तो चौक के एक साइड में सामान से लदा एक टेम्पो खड़ा था और एक आदमी ट्रैफिक पुलिस वाले से कोई बहस कर रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे वो आदमी पुलिस वाले को रिश्वत ले छोड़ने को कह रहा हो और पुलिस वाला मान नहीं रहा था।
 
मैं ये सब देख मुस्करा रहा था कि तभी मेरे दिमाग की घंटी बजी। अरे, कहीं ये वही टेम्पो तो नहीं जिसमे मिश्रा जी का सामान चोरी हुआ था। इतनी दूर से उस आदमी को पहचानने की कोशिश कर रहा था, उसी वक़्त पीछे से किसी ने हॉर्न बजाया। रेड लाइट ग्रीन हो चुकी थी। 
 
मैंने चौक को पार किया और साइड में मोटरसाइकिल रोक सोचने लगा की क्या किया जाए। एक योजना दिमाग में आते ही मैंने मोटरसाइकिल घुमाई और आहिस्ते से ड्राइव करते हुए उस टेम्पो का पीछे गया। टेम्पो के पीछे वही शिवजी का डमरू और त्रिशूल बने हुए थे। उस आदमी को देख अब मुझे यकीन हो चुका था कि ये वही है। 
 
मैं रुका नहीं पर फिर से चौक पार कर रुक गया। मैंने अपना मोबाइल निकाला और अपने इलाके के इंस्पेक्टर को उनके मोबाइल पर फ़ोन कर सारी बात बता दी। उन्होंने ने मुझे कहा की वो अभी पुलिस वैन भेज रहे हैं मगर, अगर टेम्पो चल पड़े तो उसका पीछा करता रहूँ। कुछ रोमाँचक सा हो रहा था। मुझ में भी इंस्पेक्टर की बात सुन हिम्मत और हौसला आ गया। 
 
तभी वो आदमी चलता हुआ टेम्पो में बैठा और टेम्पो चल पड़ा, शायद ट्रैफिक पुलिस वाले ने उसे जाने दिया था। मैंने भी अपनी मोटरसाइकिल उसके पीछे लगा दी। मेरी शकल  नहीं सकता था वो क्योंकि मेरा सारा चेहरा तो हेलमेट में छुपा था। 
 
कुछ ही दूर गए होंगे कि मेरा मोबाइल बजा और इंस्पेक्टर ने पुछा के टेम्पो और मैं कहाँ हैं। मैंने उन्हें रोड का नाम बताया और एक दो मिनट में पुलिस वैन ने उस टेम्पो को रुकवा लिया। टेम्पो के रुकते ही मैं भी वहां पहुँच गया।
 
पूछने पर उसने बताया की वो किसी का पुराना सामान खरीद कर ले जा रहा है। उसने इंस्पेक्टर को एक लेटर भी दिखाया जिस पर लिखा था ” मैंने अपने घर का सारा सामान इस आदमी को 30,000 रूपए में बेच दिया है, इसे सामान लेजाने दिया जाए।” नीचे किसी का नाम, हस्ताक्षर और एक पता लिखा था।
 
इंस्पेक्टर तो सब जानता था इसलिए वो टेम्पो समेत सब आदमियों को थाने ले आए। मैं भी अपने घर चला आया। 
 
शाम को जब मिश्रा जी घर पहुंचे तो उन्हें मैंने सारी बात बताई। वो भी काफी खुश हुए कि चोर के पकड़े जाने पर शायद उनका सामान मिल जाए। हम अभी बात ही कर रहे थे की इंस्पेक्टर का फ़ोन आया और मुझे थाने आने को कहा। मिश्रा जी भी मेरे साथ चल दिए। 
 
थाने पहुँच कर पता चला कि लेटर पर लिखे पते पर जब कांस्टेबल भेजा तो पता चला की वहाँ से ये चोरी कर सामान ले जा रहे थे। लेटर तो उस आदमी ने खुद ही बना लिया था। इसका मतलब मिश्रा जी के नाम का लेटर भी इसने जरूर पहले ही बना लिया होगा।
 
अगले दिन पुलिस ने उसके ठिकाने पर छापा मारा और बहुत सा चोरी का सामान बरामद किया। उस सामान में मिश्रा जी का सामान नहीं था। 3 महीने बीत चुके थे सो अब तक तो उसने बेच दिया था। 
 
हालांकि मिश्रा जी का सामान नहीं मिला पर फिर भी हम सब खुश थे की एक चोर पकड़ा गया। इंस्पेक्टर ने मेरी तारीफ की, मुझे धन्यवाद दिया कि मेरी वजह से ही ये गिरोह सलाखों के पीछे है। 


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