बदलाव संभव है – Cleanliness is next to Godliness

 

बदलाव संभव है

मैंने रोज़ सुबह घर के पास पार्क में टहलने का नियम बना रखा है। सुबह की शुद्ध और ठंडी हवा और फिर रँग बिंरंगे फूल पत्तियों को देख दिल की शुरुआत करता हुँ। 

 
काफी दिन से वहां एक बुजुर्ग महिला भी सैर के लिए आने लगी हैं। लगता है इस इलाके में नए शिफ्ट किए फॅमिली की सदस्य हैं। उन महिला से अच्छी तरह से चला भी नहीं जाता, शायद घुटनों में दर्द की वजह से। लेकिन सुबह पार्क में आना जैसे उनके जीवन का एक अंग हो। 
 
मैं अक्सर देखता था कि वो महिला धीरे धीरे चल कर एक पार्क में लगे बेंच की तरफ जाती और कुछ देर वहां बैठ कर दुसरे बेंच की तरफ निकल पड़ती। हमारा पार्क बहुत ही बड़ा है इसलिए उसका एक चक्कर लगाने में १०-१२ मिनट का समय लगता है। मैं चक्कर लगता हुआ उन्हें हर बार किसी दूसरे बेंच पर ही देखता। 
 
एक दिन मैंने कुछ ज्यादा तेजी से पार्क के चक्कर लगा लिए और काफी थकान महसूस होने लगी। सो मैं एक बैंच की तरह चल दिया ताकि घर लौटने से पहले कुछ सुस्ता लूँ।
 
अभी मैं बेंच पर बैठने ही वाला था की उस महिला ने मुझे आवाज दी ” बेटा, तुम इधर वाले बेंच पर बैठ जाओ, वो अभी मैंने साफ़ नहीं किया।” 
 
साफ़ नहीं किया, सुन मुझे कुछ झटका सा लगा। मैं कभी बेंच को देखता तो कभी उन महिला को। आखिर क्या कहना चाहती हैं वो। तब मेरी नज़र उनके हाथ में पकड़े एक कपड़े पर गयी। 
 
मैंने बड़े ही आदरसहित उन से पूछा ” पर आप क्यों साफ़ करेंगी इस बेंच को।” 
वो महिला मुस्कराते हुए मेरी तरह आयी और बोली ” बेंच बैठने के लिए है सो साफ़ तो होनी चाहिए, मैं करूँ या कोई और, क्या फर्क पड़ता है।”
 
अब मेरी समझ में आया कि वो हर थोड़ी देर में एक दूसरे बेंच के पास क्यों मिलती हैं। मगर उनके निस्वार्थ कार्य को देख मेरे मन में उनके प्रति बहुत सी श्रद्धा उमड़ पड़ी। 
 
अब तक वो इस बेंच को कपडे से साफ़ कर चुकी थी सो वो और मैं उस पर बैठ गए। 
 
मैंने पूछा ” माताजी, आप यहाँ नए आये हैं क्या, कुछ दिनों से पहले कभी देखा नहीं।”
” हाँ, मेरे बेटे का ट्रांसफर हुआ है यहाँ।” 
उत्सुकता वश मैंने पुछा ” क्या आप रोज़ यहाँ के सभी बेंच साफ़ करती हैं।” उनके हाँ कहने पर मैं सतब्ध रह गया। 
” मगर ऐसा क्यों।” 
 
तब उन महिला ने कहा ” बेटा, साफ़ सफाई सब को अच्छी लगती है, बस कुछ सुस्ती, कुछ समय का अभाव, कुछ अज्ञानता लोगों को स्वछता से दूर ले जाती है।” ” हर एक व्यक्ति जो बेंच पर बैठता है, अगर बैठने से पहले साफ़ कर ले तो हमारा पार्क कितना और सुन्दर लगेगा। मगर हर बैठने वाला सोचता है, कोई और कर लेगा।”
 
” पर माताजी, अगर लोगों को सफाई की नहीं पड़ी तो आप अकेली क्यों करें।”
 
” शुरुआत तो किसी न किसी को करनी ही पड़ती है, सो मैंने कर दी। अब तुम खुद देखना की कल से तुम जिस बेंच पर बैठोगे, साफ़ कर के ही बैठोगे।” 
 
मेरा शीश उनके आगे नमस्तक हो गया और मैंने साफ़ सफाई की कसम खायी। यह सुन वो मुस्करा दी और मुझे आशीर्वाद दिया। 
 
 
घर लौटते हुए सोच रहा था कि बदलाव संभव है, बस किसी एक के पहल करने की देर है

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