बेईमानी की सजा – Moral Story

बेईमानी की सजा

कई साल पहले एक राज्य में महामारी फैल गयी। उस महामारी से प्रजा में हाहाकार मच गया क्योंकि बहुत से आदमी, औरतें, बच्चे, बूढ़े उस की चपेट में आकर मरने लगे। 
 
सब ने मिल कर राजा से गुहार लगायी कि पास के किसी राज्य से कोई वैद्य को बुलाया जाए ताकि बीमारी पर काबू पाया जा सके। राजा मान गया और खूब सारा धन दे कर अपने एक मंत्री को दूसरे राज्य से दो-तीन वैद और बहुत सी दवा लाने को भेज दिया। 
 
इतना सारा धन ले जाते हुए मंत्री के मन में खोट आ गया कि क्यों न इस धन का आधा भाग हड़प लिया जाए। उसने एक योजना बनाई और एक खेत में आधा धन गाड़ दिया। दूसरे राज्य पहुँच उसने तीन वैद्य अपने साथ चलने को तैयार कर लिए और उन से पूछ कुछ दवा भी खरीद ली। सब इंतज़ाम कर मंत्री वापिस लौट चला। 
 
अपने राज्य पहुँच उसने एक धर्मशाला में सारी दवा रख दी और वैद्यों के ठहरने का इंतज़ाम भी कर दिया। अगले दिन मंत्री ने प्रजा को खबर दे दी कि सब बीमार लोग धर्मशाला जा करअपना इलाज करवा सकते हैं।
 
प्रजा बहुत खुश हुई और सब अपने बीमार परिवार वालो को ले धर्मशाला पहुँच गए। कुछ दिन में बहुत से लोग इलाज से अच्छे होने लगे और राजा और मंत्री का धन्यवाद भी करने लगे। 
 
शाम को जब भीड़ ख़तम हुई तो वैद्यों ने इतने सारे लोगो का इलाज करने से दवा का भण्डार कम होने की बात मंत्री को बताई और इस बार ज्यादा दवा मंगवाने को कहा। मंत्री ने चिंता जताते हुए कहा कि वो प्रजा को दुखी नहीं देख सकता इस लिए अभी दूसरे राज्य जाकर और दवा का प्रबंद करेगा।
 
मगर दवा आती कहाँ से, धन का आधा भाग तो पहले ही मंत्री हड़प चुका था। रात को जब सब सो रहे थे तो मंत्री ने दवा के घोल वाले बड़े बर्तनों में खूब सारा पानी मिला दिया। अब ऐसा लगने लगा था जैसे दवाइयाँ दुबारा मँगवा कर बर्तनों में भर दी गयी हों। सुबह जब वैद्य जागे तो दवा वाले बर्तनों को भरा देख प्रसन्न हुए और मंत्री की प्रशंसा की। 
 
लोगों का इलाज चलता रहा। कुछ पहले से बेहतर हो रहे थे तो कुछ पर दवा का असर ही नहीं हो रहा था। वैद्य भी परेशान थे, आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। दवा पहले इतना असर दिखा रही थी पर अब बीमारी पर असर कम क्यों हो रहा है। फिर भी बेचारे वैद्य मरीजों को देखते रहते और जल्दी ठीक होने का आश्वासन देते रहे। 
 
एक रात सब वैद्य जब सो रहे थे तो किसी ने जोर जोर से उनका दरवाजा पीटना शुरू कर दिया। हड़बड़ा कर उठे और क्या देखते हैं कि मंत्री जी अपने 4 साल के बेटे को गोद में उठाए खड़े हैं। वैद्यों ने बच्चे को लिटा कर जब देखा तो पता चला कि मंत्री का बेटा भी उस महामारी की चपेट में आ गया था।
 
इतना सुनना था कि मंत्री के होश उड़ गए और वह अपनी छाती पीटता हुआ रोने लगा। वैद्यों ने बहुत समझाया कि चिंता की कोई बात नहीं, अभी दवा दे देते हैं एक दो दिन में ठीक हो जाएगा। पर मंत्री कैसे शांत होता, आखिर उसे तो पता ही था कि दवा में तो पानी मिला हुआ है और उसका कोई असर नहीं होगा। 
 
मगर करता क्या, अगर वैद्यों को बता देता कि दवा में पानी है तो फँस जाता और राजा उसे फांसी दे देता। हार कर बेटे के सिरहाने बैठ उसके ठीक होने का इंतज़ार करने लगा। दवा में तो पानी ज्यादा था सो असर भी नहीं हुआ और दो दिन बाद मंत्री के बेटे की मौत हो गयी।
 
बेटे की मौत ने उसे पगला दिया और उस पागलपन में बड़बड़ाते हुए मान लिया कि दवा में पानी उसने मिलाया है। फिर क्या था, राजा ने उसे पकड़ कारावास में डाल दिया और दुबारा से शुद्ध दवा मंगवाने का इंतज़ाम किया। शुद्ध दवा आने से सब बीमार अच्छे हो गए और फिर एक बार उस राज्य में खुशहाली की लहर दौड़ पड़ी। 
 
 
बच्चों, इस कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि जो अपने स्वार्थ के लिए किसी और का बुरा करता है उसका फल उसे स्वयं ही भुगतना पड़ता है। इस लिए पराये धन का लालच नहीं करना चाहिए और जो काम तुम्हे करने को दिया जाए उस में बेईमानी नहीं करनी चाहिए। 


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