कबूतर और लोमड़ी – Moral Story for Kids

कबूतर और लोमड़ी

   

जंगल में एक बड़े से पैर के ऊपर एक कबूतर अपना घोंसला बना कर रहता था। उसके तीन बच्चे भी उसके साथ घोंसले में रहते थे। बच्चे बहुत छोटे थे और उन्हें उड़ना भी नहीं आता था। 

 

उसी पेड़ के पीछे एक लोमड़ी भी रहती थी। वो जब भी कबूतर को देखती उसके मुँह में पानी आ जाता। वह सोचती, ” काश ! मैं इसे खा सँकू “

 

एक बार बहुत बारिश हुई। चरों तरफ पानी भर गया। लोमड़ी को खाने को कुछ नहीं मिला। बारिश थी कि बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी। और लोमड़ी का भूख से बुरा हाल था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। 

 

अचानक उसे ख्याल आया ” अरे! पेड़ पर तो कबूतर और उसके बच्चे रहते हैं। क्यों न उन्हें खाने की तरकीब सोचूँ। मजा आ जाएगा। “

 

लोमड़ी ने कबूतर को आवाज दी, ” अरे! कबूतर राजा। कहाँ हो। कई दिन से तुम्हे देखा नहीं। जरा नीचे तो आओ, थोड़ी गप्प-शप्प हो जाए। मन बहुत उदास हो रहा है। “

 

कबूतर ने सोचा, ” चलो, थोड़ी देर के लिए लोमड़ी से मिल आता हूँ। वह खुश हो जाएगी। “

 

जैसे ही कबूतर लोमड़ी के पास पहुँचा लोमड़ी ने झट से उसे पकड़ने की कोशिश की। लेकिन कबूतर समझ गया कि लोमड़ी उसे खाना चाहती है। बस फिर कबूतर फुर्र से उड़ कर पेड़ पे जा बैठा और लोमड़ी देखती ही रह गई। 

इसीलिए कहते हैं – बुरे पर सोच-समझ कर विशवास  करना चाहिए। “

 

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