स्कूल का हीरो-School Hero

प्रिंसिपल साहब ने चपरासी से कहा ” फ़ौरन जाओ और सुधीर को बुला लाओ। अगर टीचर कुछ कहे तो कह देना मैंने बुलाया है। ” 

असल में उन्हें अभी पता चला था कि शिक्षा विभाग ने इस साल राजकीय खेल प्रतियोगता उनके स्कूल में करने का फैसला लिया था। स्कूल के लिए गर्व की बात तो थी ही और साथ में एक सुअवसर था प्रतियोगता आयोजन सुनियोजित ढंग से कर दिखाने का। ये सब पता चलते ही प्रिंसिपल साहब के दिमाग में किसी टीचर का नहीं बल्कि पहले अपने सबसे होनहार छात्र सुधीर का नाम ही आया।   
कुछ देर बाद सुधीर प्रिंसिपल साहब के सामने खड़ा था। उन्होंने उसे स्कूल को मिले इस सुअवसर की बात बताई। सुधीर भी बहुत खुश और काफी देर तक दोनों इस विषय पर बातचीत करते रहे। 
सुधीर पढाई-लिखाई में ही नहीं बल्कि वाद विवाद और खेलों में भी निपुण था। कई प्रतियोगताओं में पुरस्कृत होकर उसने स्कूल की धाक पुरे राज्य में जमा दी थी। अपने स्कूल में या राज्य भर में कहीं भी को प्रतियोगता का न्योता आता तो सबसे पहले सुधीर का ही नाम लिया जाता। इसिलए, सारे स्कूल के छात्र उसे अपना आदर्श मानते थे और कभी-कभी तो अपने छोटे-मोटे झगड़े या परेशानी ले उसके पास पहुँच जाते। कुछ छात्र तो उसके आस-पास ही मंडराने में अपनी शान समझते थे।
सब टीचर भी उसे अपना स्टार स्टूडेंट मानते और उससे से उसी प्रकार व्यवहार करते। क्लास में भी उसकी तारीफ के पुल बांधते न थकते। हर किसी छात्र को उसकी मिसाल दे, उसके जैसा बनने को कहते। उसकी किसी गलती पर भी उसे न टोकते, परीक्षा में उत्तर ठीक न होने पर भी नंबर दे देते। यह मानो कि जैसे सारा का सारा स्कूल सिर्फ उसे खुश करने में ही लगा रहता। 
छात्रों से सारा दिन घिरे रहना, अक्सर छात्रों को उसकी प्रशंसा करते रहना, टीचर्स का उसे अपनी आँखों पर बैठाना, इन सब की वजह से सुधीर अपने को हीरो समझने लगा। इतनी वाह-वाही होने पर अपने को उन सबका लीडर समझने लगा। उसके मुँह से कुछ पूरा निकलता भी न था कि उसकी फरमाइश उसके पास खड़े छात्र पूरी कर देते। 
स्कील के बाद अपनी लोकप्रियता के बादलों में तैरता हुआ घर पहुँचता और किताबें इधर उधर फेंक सोफे पर लेट कर टीवी देखने लग जाता। माँ कभी उसे डांट भी देती कि किताबें संभाल कर रखा करो, मगर फिर थका जान वहीँ सोफे पर ही उसे चाय नाश्ता दे देती। टीवी देखते हुए ही आवाज लगा देता कि यह दे दो यां वह दे दो और माँ भी उसे दे देती। कुछ देर बाद बहन भी कॉलेज से लौट आयी तो उस पर भी अपना हुकुम चला देता। कभी एक फरमाइश तो कभी दूसरी फरमाइश करता ही रहता मगर टीवी के आगे से उठ कर खुद अपना काम नहीं करता। 
खेलकूद में फर्स्ट और पढाई में भी खूब अच्छे अंक मिलने पर घर में भी माँ और बहन की आँखों का तारा बन चुका था। हीरोगिरी ने उसके दिमाग में अपना घर बना लिया था जिसकी वजह से वो घर के किसी भी काम में कोई हाथ न बटाता था। सब ऐसे ही चलता रहता अगर उसके पिता 2 साल बाद दुबई से वापिस न आ जाते। उसके पिता एक इंजीनियर थे और एक कंपनी से अनुबंध कर दुबई 2 साल के लिए चले गए थे। 
वापिस आने पर सुधीर के इस रवैये को देख उन्हें बढ़ी ही चिंता और हैरानी हुई, मगर वह शांत रहे। 
एक दिन काम से लौट घर पहुंचे तो सुधीर को हमेशा की तरह टीवी के सामने लेटे पाया। पास बैठ कर उसे एक गिलास पानी लाने को कहा। मगर सुधीर को तो कोई काम न करने का आदी हो चुका था, सो दूसरी तरफ मुँह कर टीवी देखता रहा। पिता को बहुत अजीब तो लगा ही साथ में दुःख भी हुआ। खैर उन्होंने खुद पानी लिया, तब तक माँ उनके लिए चाय नाश्ता ले आयी। 
अगले दिन सुबह सुधीर स्कूल के लिए निकलने लगा तो पिता ने कहा ” बेटे, जाने से पहले बाहर से अखबार पकड़ा देना। ” मगर पिता को अखबार दिए बिना ही सुधीर स्कूल को निकल गया। 
 शाम को हमेशा की तरह सुधीर टीवी के सामने बैठा था। तभी उसके पिता अंदर दाखिल हुए और समोसों से भरा लिफाफा मेज पर रख सुधीर की माँ और बहन को आवाज दी। दोनों समोसे देख खुश हुई और माँ प्लेट लेने अंदर चलने लगी तो पिता ने उन्हें बैठने को कह सुधीर से कहा कि वह प्लेट लाए। अपने को स्टार समझने वाले सुधीर ने फिर मुँह दूसरी तरफ कर न कोई जवाब दिया और न ही प्लेट लेने गया। 
पिता ने लिफाफा उठाया और अपने कमरे में चले गए। बाहर आए, किचन में से 3 प्लेटें ले अपने कमरे में जाते हुए सिर्फ सुधीर की माँ और बहन को बुलाया। सुधीर को अनदेखा सा कर दिया। तीनो ने मिल कर सारे समोसे खाए और गप्पे लगाने लगे। ऐसे करने के लिए पिता ने ही उन्हें समझाया था। 
उधर सुधीर अपने को अकेला सा महसूस करने लगा और चुपचाप टीवी देखता रहा। रात को खाने के समय भी किसी ने उसे नहीं बुलाया। सबने खाना खाया और सोने चले गए। कुछ देर बाद, सुधीर के पेट में चूहे दौड़ने लगे। माँ और बहन को आवाज दी, मगर किसी ने भी न जवाब दिया और न ही आकर उसका हाल पूछा। अजीब तो लगा मगर अपनी अकड़ के कारण वो उस रात भूखा ही सो गया। 
सुबह उठा तो याद आया कि राजकीय प्रतियोगता के लिए स्कूल टीम का कप्तान चुने जाने पर उसने सबको पार्टी देने का वायदा किया था। जल्दी से तैयार हो माँ के पास गया और 1 हजार रूपए मांगे तो माँ ने कह दिया कि अब तो पापा आ गए हैं उनसे ही मांग लो। माँ के दो टूक जवाब को सुन वह पापा की तरफ गया तो देखा पिता अखबार पढ़ रहे थे। पास जा खड़ा हुआ और बोला ” मुझे कुछ पैसे चाहिए। ” अखबार पढ़ते हुए पिता ने बिना कुछ बोले अखबार और ऊपर कर अपना मुँह दूसरी तरफ कर लिया। 
गुस्सा तो बहुत आया पर करता क्या, पार्टी न देने पर तो स्कूल भर में उसकी नाक कट जाएगी। अपने गुस्से को पीते हुए उसने दुबारा पापा से पैसों के लिए कहा तो अखबार नीचे रख पापा उठ कर वहाँ से चले गए। अब क्या होगा, उसके दिमाग में सब छात्रों के चेहरे घूमने लगे जो पार्टी न दिए जाने पर खुल कर उसका मजाक उड़ा रहे थे। यह सब सोचते ही उसका चेहरा फक पड़ गया और ऐसे लगा मानो अभी रो पड़ेगा। कैसे करेगा सबका सामना। आज स्कूल नहीं जाने की सोच चुपचाप अपने कमरे में जा बैठा। किसी ने भी आकर नहीं पुछा कि स्कूल क्यों नहीं जा रहा। 
कुछ देर बाद बाहर से सबके नाश्ता करने की आवाजे आने लगी। कल रात से कुछ नहीं खाया था सो पेट भी जैसे पीठ से चिपक गया था। उसे हैरानी हुई कि यह कैसे माँ बाप है जो बच्चों को खिलाए बिना खुद बैठे नाश्ता कर रहे हैं। भूख से तंग आकर उसने बाहर जाने के लिए कदम उठाया ही था कि अकड़ के जाल ने उसे रोक लिया। 
मगर तभी दिमाग ने काम करना शुरू किया तो समझ आया, कब तक स्कूल नहीं जाएगा। कब तक सहपाठियों को पार्टी देने से बचता रहेगा। पार्टी तो छोड़, कब तक भूखा प्यासा अंदर कमरे में छिपा बैठा रहेगा। प्रतियोगता का क्या होगा। क्या उसकी प्रशंसा करने वाले अब उस पर ताने कसेंगे, क्या सब छात्र जो उसे अपना आदर्श मानते हैं उसका तिरस्कार करेंगे।
यही बातें दिमाग में चल रही थी कि एकदम से दिमाग में बिजली सी कौंधी। क्या सिर्फ एक पार्टी न देने पर सब उसका मजाक उड़ाएंगे, तो क्या मैं कुछ नहीं सिर्फ पार्टी ही सब कुछ है। तो इसका मतलब मेरा हीरो बनना सिर्फ एक छलावा या सपना सा है, क्या ये प्रशंसा क्षणिक मात्र ही है। कल कोई दूसरा छात्र मुझसे ज्यादा अच्छा खेलेगा तो सब उसके प्रशंसक बन उसके आगे-पीछे घूमेंगे। 
यह सब बातें उसके दिमाग में चक्कर काट रही थी। माँ-बहन ने अपनी आँखों पर बैठा कर मेरी सब जरूरतों को पूरा कर दिया तो क्या मैं अपने को यहाँ का भी हीरो समझने लगा हुँ। स्कूल में तो दौड़-दौड़ कर सबके काम में हाथ बटाता हूँ ताकि सब मेरी प्रशंसा करें लेकिन घर के किसी काम में हाथ बटाने से क्यों कतराता हूँ। शायद, पापा ने अपनी बेरुखी दिखा मुझे सीधे रास्ते पर चलने की नसीयत दी है। 
बस फिर क्या था, बाहर निकला, खुद किचन से प्लेट ले आया और सबके साथ बैठ नाश्ता करने लगा। नाश्ता ख़तम होने के बाद तुरंत सबकी प्लेटें उठा किचन में रख आया, मेज से बाकी सामान उठा सही जगह रख मेज को साफ़ किया। ये सब देख सबके चेहरे पर हलकी सी मुस्कान दौड़ गयी। माँ ने उसे गले लगाया और पिता ने पहले उसे 1 हजार रूपए दिए फिर पास बैठा कहा। 
बेटा, कभी अपनी कामयाबी को अपने सर इतना न चढ़ने दो कि तुम खुद को भगवान ही समझने लगो और दूसरों को तुच्छ। 

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