सोने की चेन -Hindi Story for Kids

सुधाकर अपने पिता, भाई सुरेश और भाभी कंचन के साथ रहता था। माँ का देहांत कुछ साल पहले हो चूका था और पिता रिटायर थे। भाई एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था। भाभी घर पर ही रहती थी और घर का सब काम खुद ही करती थी। सब खुश ही थे कि एक दिन अचानक पिता भी उन्हें छोड़ भगवान को प्यारे हो गए। 
सुधाकर पिता की आकस्मिक मृत्यु से बहुत गहरे सदमे में था और अपने को अनाथ समझने लगा था। पिता की मौत पर ढेर सारे रिश्तेदार घर में इकठा हुए थे। क्योंकि बड़ा भाई सुरेश नौकरी करता था और उसकी शादी भी हो चुकी थी तो सब रिश्तेदारों को सुधाकर की चिंता थी। सुरेश ने सबको अपनी तरफ से आश्वासन दिया कि वह और उसकी पत्नी हमेशा सुधाकर का ध्यान रखेंगे। 
घर में सब ठीक चल रहा था। सुधाकर के भाई-भाभी उसका अच्छी तरह से ख्याल रखते थे। इस साल उसका स्कूल का आखिरी साल था। उसने परीक्षा दी और उसके नतीजे का इंतज़ार करने लगा। नतीजा आया तो पता चला की उसने अपने स्कूल ही नहीं बल्कि पूरे जिले में टॉप किया था। ख़ुशी भरा वो घर पहुंचा और भाभी को खबर सुनाई तो उसने भी उसे गले लगा लिया और खूब सा आशीर्वाद दिया। 
रात को कंचन भाभी ने सुधाकर का मन-पसंद खाना बनाया और बड़े भाई सुरेश के साथ मिल उसके इतने अच्छे अंकों से पास होने पर खूब जश्न मनाया। देर रात तक गप्पें मारने के बाद सब सोने चले गए। 
अगले दिन सुरेश और कंचन की शादी की दूसरी सालगिरह थी। उठते ही सुधाकर ने भाई और भाभी को बधाई दी। तैयार हो सुरेश जब ऑफिस के लिए निकलने लगा तो बोला ” कल सुधाकर के पास होने का जश्न था, आज भी तैयार रहना हम इस सालगिरह का जश्न भी धूम धाम से मनाएंगे। “
आज रात भाभी ने सुरेश के मन-पसंद पकवान बनाये और सुरेश के आने का इंतज़ार करने लगे। सुरेश आया तो सबसे पहले सुधाकर ने आगे बढ़ कर उसे और भाभी को फूलों का एक गुलदस्ता उपहार स्वरुप दिया। हंसी ख़ुशी बातें करते हुई तीनो भोजन का आनद लेने लगे। खाना खाने के बाद सुरेश ने अपनी पत्नी कंचन को एक काफी भारी सोने के चेन उपहार में दी। चेन पाकर तो भाभी की खुशी का ठिकाना न रहा। 
अगले दिन रविवार था सो किसी को उठने की जल्दी नहीं थी। आखिर 9 बजे तीनो जब नाश्ता करने बैठे तो सुरेश ने सुधाकर से आगे पढाई के बारे में बात की तो सुधाकर ने झट से कह दिया कि वह तो डाक्टर बनना चाहता है। 
” डाक्टर, डाक्टर बनने के लिए तो बहुत सारा पैसा लगेगा। ” यह कह सुरेश सोच में पड़ गया। आखिर उसने खुद भी तो सिर्फ B.A तक की पढाई की थी और उसके बाद नौकरी। और नौकरी भी कोई बहुत बड़ी नहीं थी कि उसके वेतन से डाक्टरी की पढाई का खर्चा निकल सके। छोटे भाई को आगे पढ़ने देने का उसका भी मन था, मगर सुधाकर का सपना डाक्टर बनने का वो कैसे पूरा कर पायेगा। 
” सुधाकर, मेरे भाई, मैं भी चाहता हूँ कि तू आगे पढ़े और अपना भविष्य उज्जवल बनाए। पर भाई, मेरा वेतन इतना नहीं है कि मैं तेरी मेडिकल कॉलेज की फीस भर सकूँ। ” बड़े भाई के मुँह से यह सुन सुधाकर को मानो झटका सा लगा। उसे पिता की याद आने लगी, अगर वह होते तो कहीं से भी उसकी फीस का इंतज़ाम कर देते। शायद भाई और पिता में यही फर्क होता है। उसके सारे सपने धराशायी हो गए। छोटा सा मुँह ले अपने कमरे में जा बैठा। 
अब तो यह घर भी उसे पराया सा लगने लगा था। पिता के जाने के बाद भाई के ऐसे व्यवहार से उसे लगा मानो इस घर से उसका दाना-पानी उठ चुका था। एक दो बार भाभी कमरे में आयी भी तो उसने कोई ख़ास बात नहीं की। दोपहर के खाने के वक्त भाई बुलाने आया तो भूख नहीं कह चुपचाप लेटा रहा। मन बहुत ही उदास हो गया था। रह-रह कर माता-पिता को याद कर आँखे भर आती। 
परसों मेरे नतीजों की वजह से हम कितने खुश थे, कल भाई-भाभी की सालगिरह का कैसे जश्न मनाया था हमने, और आज सब रिश्ते पराए हो गए। तभी उसके मन में एक बिजली सी कौंधी। वो बिस्तर पर उठ बैठा। 
सुरेश भइया कहते हैं की फीस के पैसे नहीं दे सकते क्योंकि वेतन कम है। तो फिर इतनी भारी सोने की चेन भाभी को उपहार स्वरुप देने की लिए पैसे कहाँ से आए। क्या पैसों की तंगी सिरफ मेरे लिए ही है। यह विचार मन में आते ही उसका मन अनेक शंकाओं से घिर गया। एक शंका का जवाब तो मिलता नहीं दूसरा संदेह उसके मन में पहले ही घर कर जाता। 
पिता की मृत्यु के बाद उनकी जमा पूँजी कहाँ गयी। क्या उस पूँजी पर उसका कोई हक़ नहीं। क्या उस जमा पूँजी का उपयोग मेरी पढाई पर होना चाहिए या भाई-भाभी के ऐशोआराम के लिए। अगर इतनी भारी चेन को ही बेच दें तो मेरी फीस निकल आएगी। इस बात को आज ही फैसला होगा। यह बात मन में आते ही गुस्से से भरा कमरे से बाहर निकला। 
साफ़ सफाई कर भाभी किचन से बाहर निकल रही थी। उसे देखते ही तुरंत बोली ” चल तू बैठ, मैं तेरे लिए गर्म चपाती बना देती हुँ। ” भाभी की बात सुन उसका गुस्सा और बढ़ गया। कभी वो भाभी को देखता तो कभी उनके गले में पड़ी वो चेन। 
” मुझे खाना नहीं, अपना हिस्सा चाहिए। ” भाभी का तो मुँह खुला का खुला ही रह गया। मगर अंदर बैठे सुरेश के कानों में यह शब्द पड़े तो वो झट से बाहर आया और बोले ” सुधाकर, तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया। “
” नहीं, मुझे पिताजी की पूँजी में आधा हिस्सा चाहिए। ” तब सुरेश ने उसे प्यार से समझाया कि उनके पिता तो कुछ भी छोड़ कर नहीं गए। यह घर भी किराये का है। 
सुधाकर समझ गया कि भाई सब हड़प गया है और उसे कुछ नहीं देगा। अगर लड़ाई लड़ता है तो माता-पिता की इज़्ज़त का क्या होगा। लोगों को तो मजे लेने का एक साधन मिल जाएगा। 
उसका दिल टूट सा गया और वह चुपचाप घर से बाहर निकल गया। अपने को किसी पर बोझ नहीं बनने देना चाहता था। कोई बड़ी सी डिग्री भी नहीं थी जो उसे कोई नौकरी दिलवा सकती। उसके स्कूल के एक मित्र के पिता सुनार थे। मित्र के कहने पर उन्होंने उसे अपने यहाँ नौकरी दे दी। वेतन थोड़ा था पर क्या करता गुजारा तो करना ही था। घर उसने छोड़ दिया था और एक कमरा लेकर रहने लगा। भाई-भाभी कई बार उसके कमरे पर उसको मिलने आए और साथ वापिस चलने को कहा। मगर सुधाकर अपनी जिद पद अड़ा रहा। वह तो उनसे कोई रिश्ता ही नहीं रखना चाहता था। 
सुनार के यहाँ काम करते हुए उसने बहुत मेहनत की और अपनी कुशलता के दम पर सुनार का विशवास भी हासिल किया। सुनार उससे बहुत खुश था। कुछ दिनों बाद सुनार का बेटा, जो सुधाकर का मित्र भी था, ने भी दूकान आना शुरू कर दिया। 
दिन बीतते गए और अपने अच्छे व्यवहार और कुशलता के दम उस सुनार ने सुधाकर को पूरा काम समझा दिया। सुनार और उसके बेटे ने अब थोक व्यापार को संभालना शुरू कर दिया था। अब, अक्सर सुधाकर ही दूकान पर आए खुदरा ग्राहकों से सौदा करने लगा था। उसके व्यवहार और कार्यकुशलता से सभी संतुष्ट थे। 
अब सुधाकर को काफी अच्छा वेतन और साथ में सेल पर कमीशन भी मिलता था। सो उसने एक नया और बड़ा घर खरीद लिया था। समय बीतने के साथ सुधाकर का भाई के प्रति गुस्सा भी कुछ हद तक शांत हो गया था। लेकिन जो गाँठ एक रिश्ते में पड़ जाती है उसे पार कर पाना इतना सहज नहीं होता। 
समय बीतता गया और एक दिन ऐसे भी आया जिसने सुधाकर की अंतरात्मा को झिंझोर कर रख दिया। 
एक दिन दोपहर के वक्त सुधाकर दुकान पर बैठा था कि तभी घबराई सी बदहवास हालत में कंचन भाभी अंदर आयी। उनकी हालत देख सुधाकर भी घबरा गया और पुछा ” क्या हुआ भाभी। ” लेकिन भाभी के मुख से कुछ भी निकल नहीं पा रहा था। चेहरे पर आए पसीने को अपनी साड़ी के पल्लू से पोछा। पसीना पोछा तो आंसुओं की झड़ी लग गयी। भाभी रोऐ जा रही थी और कुछ कहने की कोशिश भी कर रही थी मगर सुधाकर के पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था। सुधाकर ने उन्हें तुरंत पानी पीने को दिया तो उनकी हालत में थोड़ा सुधार हुआ। 
तब कंचन भाभी ने बताया कि सुरेश हॉस्पिटल में कई दिनों से भर्ती है। उनके दिल के एक वाल्व में खराबी आ गयी थी। और डॉक्टर का कहना है कि अगर जल्दी से ऑपरेशन नहीं किया गया तो उनकी जान को खतरा है। यह सुन सुधाकर को बहुत दुःख हुआ और उसने भाभी को ढाढ़स बंधाया और पुछा ” घबराओ नहीं भाभी, भइया जल्दी ही ठीक हो जाएयेंगे। “
भाई की तबियत इतनी ख़राब होने से सुधाकर को बहुत दुःख हुआ। आखिर खून का रिश्ता जो था। अच्छा बुरा, भाई तो भाई ही होता है। और फिर भइया-भाभी के अलावा इस दुनिया में उसका अपना और कौन था। 
खुद को संभालने के बाद सुधाकर ने पुछा ” पर भाभी ऑपरेशन करने में परेशानी क्या है। आजकल तो बहुत सी नयी तकनीक यहाँ उपलब्ध है जिससे इलाज़ जल्दी और अच्छा होता है। ” सुधाकर की बात सुन भाभी ने मुँह नीचे करते हुए उसे बताया ” असल में तेरे भइया बीमारी की वजह से 3-4 महीनों से काम पर नहीं जा सके तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया है। जितना उनका वेतन था उसमे से बचाना तो दूर घर का खर्चा भी मुश्किल से ही चल पाता था। अब डॉक्टर ऑपरेशन के लिए 2 लाख रूपए मांग रहे हैं। अब तू ही बता, इन हालात में मैं 2 लाख कहाँ से लाकर उन्हें दूँ। “
सुधाकर समझ गया कि भाभी उससे 2 लाख रुपए मांगने ही आयी हैं। उसका गुस्सा फिर से लौटने लगा। ” पिताजी की सारी पूँजी इतनी जल्दी उड़ा दी। ” इतना सुन भाभी फिर फफक कर रोने लगी। भाभी ने सुरेश भइया की कसम खाकर  सुधाकर को समझाया कि पिताजी भी एक नौकरी करते थे और जो भी वेतन उन्हें मिलता था वो घर खर्च में चला जाता था। बचा कर रखा होता तो पूँजी होती न। 
सुधाकर सोच में पड़ गया, क्या भाभी सच कह रहीं है, या सिर्फ उससे 2 लाख लेने के लिए सचाई पर पर्दा डाल रहीं हैं। इसी उलझन में पड़े सुधाकर ने भाभी के चेहरे के भाव पड़ने के लिए जैसे ही उनको धयान से देखा तो उसे एक झटका लगा। 
सामने भाभी बैठी थी और उनके गले में वही भारी मोटी सोने की चेन पड़ी थी। 
अरे, इतना सोना लाद रखा है, तो इतनी विपता भरे समय में इसे बेच कर भाई का ऑपरेशन क्यों नहीं करवा लेती। सुधाकर की नजर अपने गले पर देख भाभी सब समझ गयी कि उसके दिमाग में क्या चल रहा है। 
उन्होंने तुरंत उस चेन को अपने गले से उतारा और सुधाकर के सामने रख दिया। सुधाकर हक्का-बक्का सा उन्हें देखने लगा। कभी वह चेन को देखता और कभी भाभी को। आखिर हिम्मत कर उसने चेन उठा ही ली। चेन हाथ में लेते ही उसे कुछ अजीब सा लगा। उसने तुरंत काउंटर से कसौटी का पत्थर उठाया और उस पर चेन को रगड़ कर देखा तो उसके चेहरा एकदम सफ़ेद पड़ गया। 
चेन नकली थी। 
उसकी हालत को देख भाभी ने कहा ” अगर असली होती तो में तुमसे रुपए मांगने से पहले इसी चेन को तुम्हे बेचने को कह देती। तुम्हारे भइया का जीवन इस चेन से बहुत ज्यादा कीमती है। ” सुधाकर की हालत ऐसी थी जैसे काटो तो खून नहीं। भाभी ने उसे फिर समझाया ” पैसों की तंगी की वजह से हम अपनी हर रोज़ की खुशियों से अपने को वंचित नहीं करना चाहते थे। इसलिए मेरे कहने पर तुम्हारे भाई ने हमारी सालगिरह पर मुझे ये सोने का पानी चढ़ी चेन भेंट की थी। मैंने उसे हमेशा असली समझ कर ही पहना है ताकि तुम्हारे भाई को कोई दुःख न हो। “
सुधाकर सब सुनता रहा, रह-रह कर सिसकता भी रहा। मैं ही कितने समय से भ्रम पाले हुए था। ग्लानि से भरा वह अपनी कुर्सी से उठा और भाभी के पास जाकर उनके पैरों से लिपट गया। उनकी आँखों का सामना करने की शक्ति नहीं थी उसमे। भाभी ने उसे गले लगाया और दोनों ने मिल कर अपने पुराने गिले शिकवे आंसुओं में बहा दिए। 
संदेह का पर्दा हटते ही सुधाकर के मन में अपने भाई के प्रति प्यार उमड़ पड़ा। उसने तुरंत भाभी को लिया और हॉस्पिटल पहुँच सबसे पहले डॉक्टर की फीस जमा करवाई फिर पहुंचा अपने भाई सुरेश से मिलने। 
संदेह और शंका में घिर कर इंसान अपना संतुलन खो देता है
और अच्छे भले रिश्तों में दरार पैदा कर देता। इन शंकाओं से बचना चाहिए। 

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