साहस की जीत

जँगल के सारे छोटे जानवर शेर से परेशान थे। अपने को उनका राजा कहने वाला शेर सब पर अपना रोब दिखता। जब भी भूख लगती किसी ना किसी जानवर को मार कर खा जाता। 

सारे जानवरों ने एक दिन अपनी सभा बुलाई। उस सभा में सबने अपने साथ बीती दुखद घटना को भी बताया। सब का मत था कि किसी तरह से इस शेर को यहाँ से भगा देना चाहिए या मार देना चाहिए। 
मगर फिर ये सवाल उठा कि इतने ताकतवर शेर जो वो कैसे मारें। सब एक दुसरे का मुँह ताकने लगे। लेकिन इतना बड़ा खतरा कौन मोल लेता। सब को अपनी जान प्यारी थी। शेर को मारने का बीड़ा उठाने का मतलब था अपनी मौत को दावत देना। 
काफी सोच विचार कर ये निर्णय लिया गया कि दो दो जानवरों की टोली बनायीं जाए। एक आगे से और दूसरा पीछे से शेर पर वार करेगा। ये प्रस्ताव सब को पसंद आया। दोनों तरफ से जब शेर पर वार होगा तो शायद वह मारा जाएगा। मगर अब सवाल उठा कि पहली दो की टोली में कौन होगा। अब भी कोई सामने नहीं आया। तब सब ने मिल कर पर्ची डालने का फैसला किया। जिन दो के नाम की पर्ची निकलेगी वही टोली बना शेर पर पहला वार करेंगे। 
बकरी के एक छोटे से मेमने को पर्ची उठाने को कहा। मेमने जो पर्ची निकली उन पर एक बन्दर और दूसरी पर एक हिरन का नाम लिखा था। बन्दर और हिरन की टोली को शेर मारने का काम सौंपा गया। दोनों बहुत परेशान थे और डर भी रहे थे। मगर इतना बड़ी सभा के सामने अपनी बुदजिली दिखाना नहीं चाहते थे। दोनों ने शेर को मारने की कसम खाई और फिर सभा भंग हो गयी। 
अगले दिन बन्दर और हिरन दोनों छुप कर शेर के आने का इंतज़ार करने लगे। कुछ देर बाद शेर आया तो दोनों ने मिल कर एक साथ उस पर हमला कर दिया। बन्दर उसकी पीठ पर चढ़ कर उसे अपने दाँतों से काटने लगा और हिरन उसके मुँह पर अपने सींगो से प्रहार करने लगा। 
अचानक हुए हमले से शेर घबरा गया और अपनी जान बचाते हुए वहां से भाग खड़ा हुआ। उसे भागता देख दोनों भी उसके पीछे भागने लगे। थोड़ी दूर जाने के बाद बन्दर और हिरन रुक गए और एक दुसरे को जीत की बधाई देने लगे। 
उतनी देर में जंगल के और जानवर भी आ पहुंचे। सब ने मिल कर बन्दर और हिरन को बधाई तो दे मगर साथ में एक चिंता भी जताई। क्योंकि शेर पर हमने हमला किया है तो इसलिए अब वो हम पर बदला लेने के लिए जल्दी ही प्रहार करेगा। तब सब ने मिल कर फैसला किया कि अब से सभी जानवर ज्यादा सतर्क रहेंगे। 
उधर जख्मी शेर अपनी रणनीति बनाने में जुट गया। उसने सोचा कि अगर ये दो मिल कर मुझ पर हमला करेंगे तो फिर हार सकता हुँ। इसलिए उसने उन पर तब हमला करने की योजना बनायीं जब वो अकेले हों। बस अपनी योजना के अनुसार वो शिकार पर निकल पड़ा। 
अगले दिन जब बन्दर पेड़ से गिरे फल उठा कर खा रहा तो शेर ने हमला कर उसको मार दिया। और कुछ दिन बाद हिरन को अकेला देख उसे भी अपना शिकार बना खा गया। 
अपने दो साथियों की इस प्रकार मौत पर दुःख जताते हुए जानवरों ने फिर सभा बुलाई। और फिर नयी टोली बनाने के लिए पर्ची निकाली गया। 
मेमने ने जब पर्ची निकाली तो उन दोनों में मेमने और बकरी का नाम लिखा था। 
मेमने का पर्ची पर नाम देख बकरी ने सभा से कहा ” देखो, मैं तो तैयार हूँ लेकिन मेरा मेमना तो बहुत छोटा है। वो भला कहाँ से शेर का सामना करेगा। ” मगर सब ने बकरी की बात को अस्वीकार कर दिए। सब की राय थी कि इस प्रकार छोटा बड़ा करते रहे तो पर्ची डालने का क्या फ़ायदा। 
तभी मेमना अपनी माँ के पास गया और उसे प्यार करते हुए बोला ” माँ, तुम चिंता मत करो। मैं अब बड़ा हो गया हुँ। शेर जितना ताकतवर नहीं तो क्या हुआ लेकिन आप मेरे सहस पर भरोसा रखो। ” मेमने की ये बात सुन सब ने मिल कर उस मेमने को शाबाशी दी। 
घर जाते हुए बकरी का मन दुखी था लेकिन मेमना उत्साह से भरा था। उसने माँ को समझाया कि हम ताकत और हमले से नहीं बल्कि अपनी बुद्धि का इस्तेमाल कर शेर को मारेंगे। और फिर उसने अपनी पूरी योजना माँ को समझा दी। 
अगले दिन बकरी और मेमना अपनी योजना अनुसार एक पुराने कुएँ के पास जा बैठ गए। कुआँ बहुत गहरा था और हमेशा हो पानी से भरा रहता था। दोनों कुएँ के पास लगी घास खाने लगे लेकिन उनके कान हमेशा शेर की आहट सुनने में लगे थे। 
कुछ देर बाद शेर वहां आया और बकरी और मेमने को देख खुश गया। सोचा चलो आज तो बकरी और मेमने का शिकार कर आराम से अपना पेट भरूंगा। दोनों के पास पहुँच शेर बोला 
” वाह री बकरी, खुद तो आयी है और साथ में मेरे भोजन के लिए अपना मेमना भी लायी है। आज तो मैं तुम दोनों को मार के खा जाऊँगा। ” और इतना स्वादिष्ट भोजन मिलने की कल्पना से ही शेर जोर से दहाड़ा। 
तभी मेमना आगे आ बोला ” शेर जी, माँ तो अकेले ही आप का भोजन बनना चाहती थी लेकिन मैं भी साथ चला आया। माँ के बगैर मैं कैसे रह सकता हुँ। ” मेमने की बात सुन शेर बहुत खुश हुआ और बोला 
“देखा बकरी, तेरा मेमना कितना बुद्धिमान है। ” और इतना कह वो दोनों को मारने की लिए आगे बड़ा। 
मगर यह क्या, मेमना हाथ जोड़ कर शेर के सामने खड़ा हो गया। ” शेर जी, आप हमारे राजा हैं। इसलिए आप का हम पर हक़ है। हमारे शरीर से आपके पेट की भूख मिटे तो हम अपने को धन्य समझेंगे। लेकिन आप हमें नहीं मार सकते, आप को कोई दूसरा जानवर ढूंढ़ना होगा। “
यह सुन शेर गुस्से से भर बोला ” कौन कहता है कि मैं तुम्हे नहीं मार सकता। तुम मेरी प्रजा हो और यह तुम्हारा कर्तव्य है कि अपने राजा की भूख मिटाओ। “
“लेकिन शेर जी, आज तो हमें मार कर खाने का दिन तो आपके भाई का है। उन्होंने ने ही हमें यहाँ बुलाया है। ” 
मेमने की ये बात सुन शेर गुर्राया ” मेरा भाई, कौन मेरा भाई। मेमने, तेरा दिमाग तो कहीं खराब नहीं हो गया। मैं यहाँ का राजा हुँ और मेरा कोई भी भाई है ही नहीं। “
तब मेमने ने शांत स्वभाव से कहा ” अगर वो आपका भाई नहीं तो फिर कौन है। देखने में तो बिलकुल आप जैसा ही लगता है। हम तो उसे भी अपना राजा ही समझकर यहाँ उनका भोजन बनने आए थे। “
गुस्से से पागल शेर ने पूछा ” कहाँ है वो शेर जो अपने को मेरा भाई बताता है और मेरे भोजन पर अपना हक़ जमाता है। “
बड़े ही भोला मुँह बना मेमना बोला ” वो तो हमें खाने से पहले नहाने गए हैं। आपको मेरी बात पर यकीन नहीं तो आप खुद ही कुएँ में झाँक कर देखलो। ” शेर को जैसे ही पता चला कि दूसरा शेर कुँए में है वो कुँए की तरफ लपका। 
कुँए में झाँक कर देखा तो उसे पानी में अपनी परछाई दिखाई दी। गुस्से से लाल पीला तो पहले ही था, बस अपना प्रतिद्वंदी देख शेर अपना आपा और मानसिक संतुलन खो बैठा। अपनी परछाई को दूसरा शेर समझ उसने हमला करने के लिए गरजते हुए कुँए में छलाँग लगा दी। कुँए में एक जोर सी छापाक की आवाज आयी और फिर शेर की गर्जना शाँत हो गयी। 
मेमना और बकरी भाग कर कुँए पर पहुंचे तो देखा शेर अब डूबने से बचने की कोशिश कर रहा था। मगर कुआँ काफी गहरा था सो उसकी सब कोशिशें नाकाम सिद्ध हो रही थी। कुछ देर बाद शेर कुँए में डूब कर मर गया। 
उसकी मृत्यु की खबर सुन जंगल के सारे छोटे जानवरों ने रहत की सांस ली। और उस छोटे से मेमने को उसके सहस और बुद्धिमानी की प्रशंसा की। 
देखा आपने, कि सहस और अपनी बुद्धि का इस्तेमाल कर कैसे एक छोटे से मेमने ने किस तरह इतने शक्तिशाली शेर को पछाड़ दिया। 
कभी कोई संकट आए या कोई दुविधाभरी स्तिथि का सामना करने पड़े तो हमें अपना सहस और विवेक नहीं खोना चाहिए। 

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