लालची दोस्त – Hindi Story for Kids

सुरेश और महेश लंगोटिया दोस्त थे। मतलब, जब से होश संभाला और लंगोट पहनना शुरू किया था तभी से उनकी दोस्ती गांव में महशूर हो गयी थी। जब देखो एक दुसरे के साथ ही मिलते थे। अच्छे और बुरे समय में दोनों ने एक दुसरे का हमेशा साथ दिया। 
गाँव में ज़्यादा कमाई करने के साधन तो नहीं थे। ना ही दोनों में से किसी एक के पास कोई जमीन थी। फिर भी दोनों मेहनत मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का गुजर-बसर कर रहे थे। बढ़ती महंगाई को देखते हुए एक दिन महेश ने सुझाव दिया कि क्यों न शहर जाकर कुछ काम किया जाए ताकि ज्यादा कमाई हो सके। सुरेश को भी यह सुझाव अच्छा लगा। और कुछ दिन बाद परिवार के खाने-पीने का बंदोबस्त कर दोनों दोस्त शहर में अपना भाग्य आजमाने चल दिए। 
भाग्य ने उनका साथ भी दिया। मेहनती तो थे ही साथ में थी अपने और परिवार का भविष्य उज्जवल बनाने की लालसा। बस भाग्य ने पलटा खाया और दोनों को खूब काम मिलने लगा। दिन-रात मेहनत और माँ लक्ष्मी के आशीर्वाद से खूब धन प्राप्ति हुई। जब दोनों के पास काफी धन एकत्रित हो गया तो सोचा क्यों न गाँव जाकर कुछ दिन परिवार के साथ रहा जाए। अपने अर्जित किये धन का लाभ उनके परिवार को मिले और वह सब खुशहाल जीवन व्यतीत करें। यह सोचते हुए दोनों गांव की तरफ निकल पड़े। 
गाँव पहुँच कर महेश ने कहा ” देखो सुरेश, आजकल ज़माना बहुत खराब है। कहीं यह न हो कि चोर लुटेरे हमारी मेहनत की कमाई चोरी कर लें। ” यह सुन सुरेश भी सोच में पड़ गया और बोला ” तो तुम्ही बताओं कि क्या किया जाए। ” महेश ने सुझाव दिया कि क्यों न इस धन को बेर के पेड़ के नीचे गाड़ दें। किसी को पता भी नहीं चलेगा और हमें जब पैसों की जरूरत होगी तो खोद कर निकाल लेंगे। ” 
सुरेश जानता था कि बेर के पेड़ के आस-पास गिरे हुए बेर खाने के लिए हर समय बच्चों की भीड़ लगी रहती थी। इस के इलावा गाँव के बड़े-बुजुर्ग हमेशा इस पेड़ की छाँव में बैठ गप्पें मारते थे। इतनी चहल-पहल वाली जगह को सुरक्षित जान कर सुरेश भी महेश के सुझाव से राजी हो गया। 
उसी रात दोनों ने मिल कर बेर के पेड़ के नीचे गड्ढा खोद सारा धन वहां गाड़ दिया। दोनों में यह भी निश्चित हुआ कि जब भी किसी को धन को आवश्यकता पड़े तो दोनों इकट्ठे ही जाकर गड़ा हुआ धन निकालेंगे। दोनों अब निश्चिन्त होकर अपने-अपने घर जाकर आराम से सो गए। 
लेकिन एक दिन महेश के मन में एक लोभी विचार ने जनम लिया कि क्यों न सारा का सारा धन वह स्वम हड़प ले। उसी लालच में पड़ कर उसने उसी रात बेर के पेड़ के नीचे गड़े हुए धन को निकाल लिया और अपने घर के पीछे दूसरी जगह दबा दिया। 
कुछ दिन बाद सुरेश को कुछ रुपयों की जरूरत पड़ी तो दोनों द्वारा की गयी निश्चित शरत के अनुसार वह महेश के पास गया और बोला ” महेश, मुझे कुछ रूपए चाहिए, चलो आज रात जब सब सो जाएं तो उसे खोद कर निकाल लें। ” महेश मान गया। 
रात को जब दोनों बेर के पेड़ के नीचे खोदने लगे तो देखा कि सारा का सारा धन तो चोरी हो चुका था। यह देखते ही सुरेश के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी और वह माथा पकड़ बैठ गया। महेश दुखी होने का नाटक करने लगा। सुरेश को समझ नहीं आ रहा था कि हमारे धन यहाँ गड़े होने का राज हम दोनों के इलावा किसी और को पता कैसे चल सकता है। लेकिन महेश उसे ढाढ़स बँधाने लगा और बोला ” हमारी किस्मत ही ख़राब है। शायद किसी ने हमें धन गाड़ते हुए देख लिया हो। “
सुरेश को हैरानी तो तब हुई जब उसने पुलिस बुलाने की बात कही तो महेश तुरंत बोल उठा ” अरे, इसमें पुलिस क्या करेगी। वो चोर तो पकड़ेंगे नहीं, उल्टा हम को ही दोष देंगे कि धन जमीन में क्यों गाड़ा। ” महेश की यह बात सुन सुरेश को कुछ अजीब सा लगा, कुछ शक सा हुआ। उसने शक दूर करने की लिए कहा ” चलो पुलिस छोड़ो, हम पंचायत बुलाते हैं। ” जब तब भी महेश आनाकानी करने लगा तो सुरेश का शक और गहरा हो गया। क्या उसके बचपन के दोस्त ने उसे धोखा दिया है। यह बात रह-रह कर उसके दिमाग में गूंजने लगी। दिल नहीं मानता था लेकिन उसकी बातें उसी तरफ इशारा कर रही थी। 
अगले दिन सुबह होते ही सुरेश ने पंचायत बुला ली। पंचायत प्रमुख ने पूरी बात सुनी और समझी। उन्होंने सुरेश और महेश को अकेले में लेजाकर पुछा भी, लेकिन दोनों ने धन चोरी करने से इंकार कर दिया। पंचायत भी हैरान थी कि जब उन दोनों के इलावा किसी को इस धन का पता नहीं था तो चोरी किसने की। 
कुछ सोचने विचारने के बाद पंचायत ने यह तय किया कि क्यों न चल कर उस जगह को देखा जाए जहाँ धन गाड़ा गया था। पंचायत और सब गाँव वाले उस बेर के पेड़ की तरफ चल दिए। तभी किसी ने ऊंची आवाज में कहा ” अरे, महेश कहाँ चला गया। ” तब सब पंच और गाँव वाले रुक महेश की राह देखने लग गए। कुछ लोग उसके घर की तरफ भी गए लेकिन महेश का कुछ पता न चला। गाँव भर में महेश को ढूंढा लेकिन कहीं मिल ही नहीं रहा था। 
सब हैरान कि अचानक महेश कहाँ गायब हो गया। यह सब हंगामा चलते दो घंटे बीत गए। तभी महेश सामने से आता दिखा तो सब की उत्सुकता बढ़ गयी। जब उससे पुछा तो बोला कि दुसरे गाँव से उसका एक दोस्त आया था जिसे वह बस अड्डे तक छोड़ने गया था। उसकी बात सुन पंचायत और बाकी गाँव वाले भी आपस में खुसर-पुसर करने लगे। खैर, सब फिर बेर के पेड़ की तरफ चल दिए। 
वहां पहुँच पंचायत वालों ने जगह को अच्छी तरह से देखा। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर ऐसे जगह जहाँ सारा दिन लोगों की भीड़ लगी रहती हो वहां कौन गड्ढा खोद सकता है। अगर खुदाई रात को हुई तो किसी और को पता कैसे चल की यहाँ धन गड़ा है। सोचते समझते हुए सरपंच के मुँह से निकला ” आखिर, धन कौन चोरी कर सकता है। ” तभी बेर के पेड़ पर बैठे एक तोते ने जोर से कहा ” सुरेश चोर है। “
तोते की आवाज सुनते ही सब उप्पर बैठे तोते की तरफ देखने लगे। सरपंच ने फिर पुछा ” चोर कौन है। ” तोते ने फिर जवाब दिया ” सुरेश चोर है। “
तोते की बात सुन सुरेश का चेहरा श्वेत हो गया। वह अवाक सा खड़ा तोते को देखता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि तोता ऐसा क्यों बोल रहा है। तभी सरपंच उसके पास पहुंचे और उसके कंधे पर हाथ रख बोले ” मैं जानता हूँ चोरी तुमने नहीं की। ” सुरेश फ़ौरन बोल उठा ” तो यह तोता मेरा नाम क्यों ले रहा है। लोग तो तोते को ही सच मानेंगे। ” तब सरपंच ने सब गाँव वालों को ऊंची आवाज में कहा ” भाईओं, चोर मैंने पकड़ लिया है। “
चोर का नाम है महेश। 
यह सुन सब गाँव वासी सरपंच की तरफ देखने लगे और एक साथ पूछने लगे ” पर सरपंच जी तोता तो झूट नहीं बोलेगा, वह तो वही कहेगा जो उसने देखा हो। ” तब सरपंच ने सबको तोते के सुरेश को चोर कहने का राज बताया ” भाइयों, तोता कभी अपनी तरफ से हमारी भाषा नहीं बोल सकता। वह तो सिर्फ उस बात को दोहरा देता है जो उसे रटाया जाए। उसे किसी ने ” सुरेश चोर है ” रटा दिया और मेरे पूछने पर उसने बोल दिया। ” 
गाँव वालों के पूछने पर कि तोते को यह किसने रटाया होगा तो सरपंच ने कहा ” महेश पंचायत से दो घंटे जो गायब था वह उसी समय तोते को पढ़ाने आया था। ” यह सुन सब महेश की तरफ तीखी नज़रों से देखने लगे तो महेश का मुखौटा चकनाचूर हो गया। उसने चोरी करने की बात स्वीकार की और अपने घर के पीछे गड़े धन की बात बता दी। 
देखा आपने, सरपंच की समझ ने कैसे सुरेश का चोरी हुआ धन उसे वापिस लौटा दिया और महेश को चोरी करने के जुर्म में बिना पगार के गाँव भर की रोज़ सफाई करने की सजा सुना दी। 
लालच करना और उस लोभी प्रवर्ति की वजह से कोई भी गलत काम करने से पहले
यह सोचना जरूरी हैं कि एक न एक दिन गलती पकड़ी ही जाएगी। 

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