लाटरी का जादू

  
गुप्ता जी रिटायर क्या हुए, उनकी तो जैसे जिंदगी ही उलट-पुलट हो गयी। 
एक प्राइवेट कंपनी में केशियर के पद पर लगभग 35 साल काम किया लेकिन सेहत ख़राब रहने की वजह से नौकरी छोड़नी पड़ी। जो महीने की बंधी हुई पगार आती थी वह बंद हो गयी। प्रोविडेंट फण्ड से जो पैसे मिले थे उनमे से अधिकतर पैसे तो बेटी की शादी में लग गए। 
पत्नी का देहांत हुए काफी साल गुजर चुके थे। एक बेटा था जो एक एक्सपोर्ट कंपनी में अच्छे पद पर लगा हुआ था। अच्छी पगार मिलती थी और साथ में बोनस भी मिलता ही रहता था। उसकी शादी एक बहुत ही सुशील स्वाभाव की लड़की से हुई थी। घर में खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी। कुल मिला कर गुप्ता जी और उनका परिवार खुश थे।
उस ख़ुशी को ग्रहण तो तब लग गया जब गुप्ता जी ने नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया। पहले जब भी वह दफ्तर से घर आते थे तो उनकी बहु दौड़ी-दौड़ी उनके लिए चाय नाश्ता लाती थी। बेटा भी जब अपने दफ्तर से आता था तो सब से पहले पिता से ही मिलता था। रात का खाना सब इकठ्ठा हो साथ में ही खाते थे। 
लेकिन रिटायर होने के बाद उनके प्रति सबका रवैया ही बदल गया। बहु-बेटा अब उन पर ज़्यादा ध्यान नहीं देती थी। अब उनके चाय पिलाने के लिए कोई नहीं दौड़ता था। जब तक दो चार बार मांग नहीं लेते थे तब तक कोई चाय तक नहीं देता था। बेटे ने तो उनसे नज़रें मिलाना तक छोड़ दिया था। जब बेटा दफ्तर से घर आता तो उसकी पत्नी दौड़-दौड़ कर उसके लिए चाय नाश्ता लाने में लग जाती। किसी को यह चिंता नहीं होती थी कि गुप्ता जी भी कई बार चाय मांग चुके हैं। 
कभी बीमार पड़ जाते तो कोई उन्हें डाक्टर तक न ले जाता। खुद ही धीमे क़दमों से चल कर पास के दवाखाने से दवा ले आते। बहु-बेटे ने कभी बीमारी तक में उनसे उनका हाल-चाल नहीं पुछा। वह दोनों तो अपने में ही मस्त रहने लगे। 
अकेलापन और कमज़ोरी ने उन्हें तोड़ दिया था। पत्नी की बहुत याद आती लेकिन उसे याद कर आंसू बहाने के इलावा वह कर भी क्या सकते थे। गुप्ता जी को ऐसा लगने लगा था कि अगर कल उनकी मृत्यु हो जाए तो क्या बेटा उन्हें कन्धा भी देगा की नहीं। रोज़ इन्ही दुःख भरी बातों के सोचते हुए न जाने कब उनकी आँख लग जाती। 
एक दिन वह बाजार से अपनी दवा लेने गए। सुबह का समय था और गुप्ता जी ने 80 रूपए की दवा खरीद कर केमिस्ट को 100 रूपए का नोट दिया। लेकिन केमिस्ट ने कहा कि आप मुझे 80 छुट्टे दे दें क्योंकि उसके पास खुले 20 रूपए नहीं हैं। गुप्ता जी परेशान कि 80 रुपये खुले कहाँ से लाएं। दवा जरूरी थी सो 100 रूपए का नोट हाथ में थाम दुकान से बाहर निकले। बगल वाली दुकान की तरफ देखा तो वह अभी बंद थी। दो कदम आगे एक दूकान खुली देख वह उसकी तरफ चल दिए। वहां पहुंचे तो वे लाटरी के टिकट बेचने की दुकान निकली। सोचा इसी से 100 रूपए खुले करवा लेता हूँ। 
अंदर कई मेजों पर लाटरी के रंग बिरंगे टिकट पड़े थे। मेजों के पीछे एक लड़का बैठा था, उसे 100 रूपए देते हुए गुप्ता जी ने खुले रूपए मांगे। उस लड़के ने एक लाटरी का टिकट और 80 रूपए गुप्ता जी के हाथ में थमा दिए। लाटरी का टिकट देखते ही गुप्ता जी ने कहा ” बेटे, मुझे टिकट नहीं, 100 रूपए खुले चाहिए।” ” अरे अंकल, सुबह-सुबह खुले कौन देगा। और फिर यह मेरी दिन की पहली टिकट बिकी है, इसे तो में वापिस नहीं लूँगा।” और जेब से उसने 20 रूपए का नोट निकल उनके सामने कर दिया। ” आप चाहो तो यह 20 रूपए भी रख लो, पर टिकट वापिस न करो।” 
अब गुप्ता जी असमंजस में पड़ गए। टिकट से ज्यादा उन्हें दवा की जरूरत थी। लेकिन जिस शराफत से उस लड़के ने उन्हें 20 रूपए वापिस करने चाहे वह थोड़ा सा मुस्करा कर टिकट और 80 रूपए लेकर बाहर निकल आए। टिकट जेब में रखी और 80 रूपए की दवा खरीद वह घर चल दिए। 
घर पहुँच घंटी बजायी तो कुछ देर बाद बहु ने दरवाजा खोला और मुँह बनाते हुए अंदर चली गयी। गुप्तजी भी अपने कमरे में गए और दवा की खुराक ले कर लेट गए। कुछ देर बाद उन्हें नींद आ गयी। दोपहर 12 बजे उनकी नींद खुली तो कुछ अच्छा महसूस कर रहे थे। शायद, दवा असर कर रही थी। कुछ देर सुस्ताने के बाद वह उठे और कुर्सी पर बैठ गए। तभी उन्हें लाटरी टिकट का ध्यान आया तो उन्होंने जेब से निकल उसे देखा। लाटरी का पहला इनाम था एक करोड़। गुप्ता जी मुस्करा दिए, एक करोड़ का इनाम तो क्या, मुझे 20 रूपए भी मिल जाएं तो चलेगा। खैर, ध्यान से देखा तो पता चला कि लाटरी का रिजल्ट तो कल ही आने वाला था। टिकट को अपने पर्स में रख दिया। 
दिन बीत गया, रात हो गयी और खाना खाकर गुप्ता जी सो गए। कई महीनों बाद उनके सपने में उनकी पत्नी से मुलाकात हुई। पत्नी मुस्करा रही थी और सपने में ही गुप्ता जी अपनी नर्क जैसे जिंदगी का दुखड़ा रो रहे थे। पत्नी सिर्फ मुस्कुराती रही और सुनती रही, लेकिन सपना टूटने से पहले कह गयी ” अब आपका दुःख दूर हो जाएगा।” और इतना सुनते ही गुप्ता जी की नींद खुल गयी। 
अँधेरे में टेबल पर पड़ी घड़ी पर नज़र गयी तो सुबह के सर 4 बजे थे। उठ कर बैठ गए और सपने में कही पत्नी की बात को सोचने लगे। कहीं मेरे दुःख दूर होने का मतलब यह तो नहीं कि मेरी मृत्यु नजदीक है। अगर ऐसा होता तो पत्नी मुस्करा क्यों रही होती, मेरे मरने पर वह खुश क्यों थी। शायद, इसलिए के मैं भी अब उसके पास पहुँच जाऊँगा। कुछ समझ नहीं आ रहा था। तरह-तरह के सवाल और उनके जवाब दिमाग में घूमने लगे। और इन्ही को सोचते-सोचते उनकी फिर से आँख लग गयी। 
सुबह 8 बजे नींद खुली तो अपने को काफी हल्का महसूस कर रहे थे। मगर, फिर वही सवाल उनके मन में घमासान करने लगे। उन्हें लगने लगा कि कहीं सच में तो आज मेरा आखिरी दिन तो नहीं। अगर, ऐसा है तो मैं घर बैठा क्या कर रहा हूँ। क्यों न आखिरी दिन घर के घुटे माहोल से निकल कर बाहर की खुली हवा का मजा लिया जाए। 
जल्दी से कपड़े पहने, अपना पर्स उठाया और घर से बाहर निकल आए। घर में तो नाश्ते तक के लिए भीख सी मांगनी पड़ती थी, मगर बाजार में तो कचौड़ी, जलेबी सब उनका इंतज़ार कर रही थी। पेट भर नाश्ता किया, कुल्लर वाली चाय भी पी। अभी चाय पीकर उठने ही वाले थे कि तभी सामने से एक लड़का आते हुए दिखा। 
लड़का कुछ जाना-पहचाना लग रहा था लेकिन याद नहीं आ रहा था। उस लड़के ने चाय का आर्डर दिया और गुप्ता जी के साथ ही बैठ गया। उन्हें देखते ही बोला “अरे अंकल आप, आज तो आपकी लाटरी का रिजल्ट 10 बजे आना है।” तब गुप्ता जो ने भी उसे पहचान लिया। मुस्कुराते हुई बोले ” भाई, हमारी लाटरी कहाँ लगेगी, यह तो किस्मत वालों की लगती है।” ” अंकल, किस्मत वाले भी भगवन के ही बन्दे होते हैं, किसी दूसरी दुनिया से नहीं आए होते।” यह कह वो हस पड़ा। 
तब गुप्ता जी को लाटरी के टिकट की याद आयी। पर्स से निकल कर उसे देखने लगे तो उस टिकट में उन्हें ऐसा लगा जैसे माँ लक्ष्मी को फोटो के स्थान पर उनकी पत्नी खड़ी मुस्कुरा रही है। आंखें नम सी हो गयी। 
10 बजे ही थे कि गुप्ता जी के कदम खुद ही लाटरी की दुकान की तरह बढ़ गए। वहां तो अच्छी खासी भीड़ जमा थी। सब रिजल्ट निकलने का इंतज़ार कर रहे थे। और रिजल्ट जब निकला तो बहुत से मायूस हो कर वहां से चल दिए। कुछ ही लोग बचे थे जब गुप्ता जी को देख वह लड़का बोला ” अंकल, अपना टिकट तो दिखाओ, शायद माँ लक्ष्मी आप पर ही मेहरबान हुई हों।” और जब टिकट का नंबर मिलाया गया तो सच में ही गुप्ता जी ने एक करोड़ का इनाम जीत लिया था। 
चारों तरफ से लोग गुप्ता जी को बधाइयाँ दे रहे थे। वह लड़का तो बार बार गुप्ता जी को गले लगा रहा था, जैसे कोई बाप अपने बेटे के फर्स्ट आने पर करता है। मगर गुप्ता जी अभी तक इस सचाई को हज़म नहीं कर पा रहे थे। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि जीवन में पहली बार लाटरी का टिकट खरीदा और वह नंबर लग गया।
आखिर जब लाटरी वाला  लगा कि कैसे उन्हें यह जीता हुआ टिकट ले कर लाटरी के दफ्तर जाना है, तब उन्हें भी यकीन हो गया कि अब वह करोड़ पति हो गए हैं। समझ में नहीं आ रहा था कि जीते हुए एक करोड़ का वह करेंगे क्या। 
खेर, करोड़ का टिकट ले वह घर पहुंचे ही थे कि उनकी बहु ने बहुत दिनों बाद ख़ुशी से उनके लिए दरवाजा खोला और झुक कर उनके पाँव छुए। दौड़ी हुई गयी और उनके लिए शरबत का गिलास ले आयी।  नाश्ते में क्या लेंगे यह भी पुछा। कुछ हैरानी तो हुई, फिर गुप्ता जी समझ गए कि लाटरी जीतने की खबर इसको मिल चुकी है। 
दोपहर के खाने की टेबल पर तरह-तरह के व्यंजन सजा कर बहु ने उन्हें खाने के लिए ज़िद कर के बैठाया, और गरमा गरम रोटियां सेक कर उन्हें खिलाई। बहु ने शायद बेटे को भी खबर कर दी थी क्योंकि अभी खाना चल ही रहा था कि बेटा कई तरह की मिठाइयां लेकर घर पहुँच गया। उसने भी आज बड़े लम्बे समय के बाद पिता के पाँव छुए और साथ में बैठ भोजन करने लगा। बीच-बीच में अपनी पत्नी को आवाज लगा देता कि पिताजी के लिए यह लाओ, वह लाओ। यह तो लाटरी का जादू बहु-बेटे से करवा रहा था। 
गुप्ता जी भी समझ चुके थे कि यह प्यार और आदर उनका नहीं बल्कि एक करोड़ की लाटरी का हो रहा है। चुप चाप मुस्कराते हुए खाना खाते रहे मगर मन अंदर से रो रहा था। तभी उन्हें सपने में आयी पत्नी के शब्द याद आ गए ” अब आपका दुःख दूर हो जाएगा।” 
गुप्ता जी के सांसारिक दुखों का अंत तो शायद एक करोड़ की लाटरी ने कर दिया था, लेकिन मन का दुःख तो शायद कभी भी कम हो पाएगा। 
रिश्ते-नाते वही लम्बा चलते हैं जो इंसानियत और एक दुसरे के प्रति प्रेम से भरे हों,
नाकि जो सिर्फ भरी जेब को देख निभाए जाएं।
अपने माता-पिता की सेवा करना हर बेटे-बेटी का फ़र्ज़ होता है,
उसे सिर्फ एक बोझ समाज कर नहीं बल्कि दिल से पूरा करना चाहिए। 

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