मेहनत का रंग – Hindi Story for Kids

व्यापारी की बेटी बड़ी हो चुकी थी। उसकी शादी को लेकर व्यापारी और उसकी पत्नी हमेशा चिंतित रहते थे। शादी ब्याह में खर्चा भी बहुत होना था, इसलिए व्यापारी पहले सी भी ज्यादा मेहनत करता था। 

एक दिन व्यापारी को सामान खरीदने दुसरे शहर जाना था। सफर पर निकलने से पहले उसने अपनी बेटी से पुछा कि शहर से उसे क्या उपहार चाहिए। 
बेटी ने उन्हें बताया ” आप मेरे लिए शहर से खूब सारे फल लेकर आना।” और व्यापारी दुसरे शहर के लिए निकल पड़ा। 
दिन भर काम कर रात को जब वापिस लौट रहा था तो रास्ते में ही एक भयानक तूफान में घिर गया। रात बहुत हो चुकी थी, बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी। और ऊपर से व्यापारी बहुत थक भी चुका था। तभी उसकी नज़र दूर जलती लालटेन के रौशनी पर पड़ी। 
वहां पहुंचा तो देखा कि रौशनी एक टूटी-फूटी झोपडी से आ रही थी। अंधी और बारिश पूरे जोर पर थी सो अपनी हैसियत भूल कर उसने अंदर प्रवेश किया। अंदर एक बांस पर लालटेन लटकी थी और उसकी धीमी रौशनी में एक मैले-कुचैले कपड़े पहने एक नौजवान खटिया पर बैठा था। झोपडी की छत से जगह-जगह पानी टपक रहा था। 
नौजवान व्यापारी को देखते ही खड़ा हो गया और उन्हें खटिया पर बैठने को कहा। व्यापारी ने उसे बताया कि वो कौन है, किस तरह इस तूफ़ान में फँस गया। उन्होंने ने उस नौजवान से रात झोपडी में रुकने की अनुमति मांगी तो वह तुरंत तैयार हो गया। 
नौजवान ने चूल्हे पर चढ़ी हांडी से दाल और चावल निकाल जब व्यापारी को परोसे तो व्यापारी बोल पड़ा ” अरे नहीं बेटा, यह तुम खा लो।” लेकिन नौजवान ने एक न सुनी और व्यापारी को खाना खाना ही पड़ा। भूख इतने जोरो से लगी थी कि वह साधारण सा भोजन भी उन्हें छप्पन भोग जैसा लगने लगा। 
खाकर, हाथ मुँह धो कर वह जब खटिया पर बैठे तो उनकी नज़र चूल्हे पर रखी हांडी पर गयी, वह तो खाली थी। उन्होंने ने उस नौजवान से पुछा कि सारा भोजन तो मैंने खा लिया अब वोह क्या खाएगा। यह सुनते ही नौजवान मुस्कराया और झोपडी से बहार निकल गया। कुछ पलों में जब अंदर आया तो उसके हाथ में कुछ अमरुद और एक पपीता था। फलों को देखते ही व्यापारी को बेटी का उपहार याद आगया। 
नौजवान ने फलों को धोया, काटा और व्यापारी का साथ मिल बाँट खाने लगा। फलों का स्वाद तो मानो शहद से भी ज्यादा स्वादिष्ट था। व्यापारी हैरान था कि इतनी रात को यह नौजवान फल लाया कहाँ से। खैर, रात बहुत हो चुकी थी सो व्यापारी खटिया पर और नौजवान जमीन पर सो गए। 
सुबह हुई तो तूफ़ान थम गया था और सूर्य देवता अपना प्रकाश फैला चुके थे। अंगड़ाई लेता हुआ व्यापारी जैसे ही झोपडी से बाहर निकला तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी। अपने जीवन में इतना सुन्दर बगीचा उसने कभी नहीं देखा था। रंग बिरंगे फूलों से भरी क्यारिओं के बीच तरह-तरह के फलों से लदे पेड़, जमीन पर हरी-भरी घास। लग रहा था, जैसे स्वर्ग धरती पर उतर आया था। 
यह सब देख व्यापारी आश्चर्य में पड़ गया और इतनी प्राकृतिक सुंदरता को देख उसका मुँह खुला का खुला रह गया।  तभी सामने से आता नौजवान उसे दिखाई दिया। व्यापारी ने बागीचे की तरफ इशारा कर तरह हाथ से इशारा कर पुछा ” यह बगीचा किसका है।”
नौजवान ने मुस्कराते हुए बताया कि यह बगीचा उसी का है। इतने सुन्दर बगीचे का मालिक और एक झोपडी में रहता है। यह बात व्यापारी को समझ में नहीं आयी। उसके और पूछने पर नौजवान ने बताया कि कुछ साल पहले उसके माता-पिता की मृत्यु हो गयी थी। बस एक यही जमीन का टुकड़ा था हमारे पास। मैंने इसे अकेले ही सींचा और यह सब फल फूल लगाई हैं। उसने आगे बताया कि फल फूलों को बेच कर बहुत थोड़ा पैसा ही मिलता है। कभी-कभी तो कुछ लोग मुफ्त में ही ले जाते हैं। 
यह सुन व्यापारी को बहुत दुःख हुआ। इतना होनहार नौजवान और इतनी गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहा है। इतनी दयनीय हालात में भी उसने उसे रात रहने का आसरा दिया। खुद न खा अपना भोजन मुझ अनजान को खिला दिया। उसके संस्कार देख उनका मन भर आया। 
नौजवान से विदा ले व्यापारी अपने घर चल पड़ा। घर पहुँच जैसे ही बेटी ने दरवाजा खोला, बोल उठी “मेरे फल कहाँ हैं।” बेटी को देखते ही उसकी सारी थकान उतर गयी। मुस्कराते हुए जवाब दिया “बेटी, मैं तेरे लिए संसार का सब से बड़ा फल लाया हूँ। जरा चैन से बैठने दे फिर दूंगा।” 
पत्नी और बेटी को अपने पास बैठा कर उन्होंने उस नौजवान और उसके बगीचे के बारे में सब बता दिया। पत्नी और बेटी का मुँह भी सब सुन खुला का खुला रह गया। लेकिन सबको अंदर से दुःख भी हो रहा था। तब व्यापारी ने दोनों को अपने मन की बात बतायी तो सब तैयार हो गए। 
अगले दिन व्यापारी उस नौजवान को मिलने गया। नौजवान ने उनका स्वागत किया। दोनों मिल बैठ बातें करने लगे। व्यापारी ने उसे समझाया और उसके साथ मिल फूलों और फलों की खेती करने का न्योता दिया। अनाथ नौजवान को किसी पिता समान व्यक्ति द्वारा इतना सम्मान और साथ में व्यापार करने का मौका बहुत भाया। उसने भी तुरंत हामी भर दी। 
अपने बाग़ बगीचे बेच नौजवान कुछ दिनों बाद व्यापारी के पास पहुंचा तो उसे देख व्यापारी बहुत खुश हुआ। उसका आदर सत्कार किया, घर के सब सदस्यों से मिलवाया और फिर सबने मिल कर भोजन किया। रात व्यापारी के पास ही बितायी। अगले दिन व्यापारी नौजवान को ले अपने खेतों की तरफ निकल पड़ा। 
खेत देख नौजवान तो चौंक सा गया। यह खेत तो शायद उसके बगीचे से 50 गुना बड़ा था। व्यापारी ने उसे अपना बगीचा वहीँ बनाने को कहा तो नौजवान की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उसने अगले दिन से ही काम शुरू करने को कहा। 
समय बीतता गया और उस नौजवान का कौशल रंग लाने लगा। खेत जो बंज़र सा पड़ा था, उसके परिश्रम से अब चारों तरफ हरा भरा हो गया था। फूलों फलों की महक तो मीलों तक महसूस की जा सकती थी। उसके खेत के फलों और फूलों को लेने लोग दूर-दूर से आने लगे थे। कुछ व्यापारी तो बड़े शहरों से भी वहां से खरीदारी करने लगे थे। नौजवान तो बस अपने खतों पर ही ध्यान देता था। बेचने खरीदने का सारा काम व्यापारी ही देखता था। 
नौजवान ने अपनी मेहनत और लगन में कोई कमी न आने दी और देखते-देखते व्यापार आसमान की ऊंचाइयां छूने लगा। लेकिन नौजवान के रत्ती भर भी कोई गरूर नहीं आया। हमेशा की तरह वो सबकी इज़्ज़त करता, मीठा बोल बोलता। 
और एक दिन व्यापारी ने उसे पास बुलाया और बहुत ही प्यार से बोले ” आज से तुम और मैं इस व्यापार में बराबर के भागिदार हैं। ” यह सुन नौजवान ने कहा ” पर जमीन के मालिक तो आप हैं, मैं तो सिर्फ फसल उगता हूँ। ” लेकिन व्यापारी ने उसकी एक न सुनी और पटवारी को बुला आधी जमीन और आधा व्यापार उस नौजवान के नाम कर दिया। 
अपना भागीदार बना कर उन्होंने उस नौजवान के साथ अपनी बेटी की शादी भी कर दी। अब सब एक बड़े परिवार की तरह खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं। 
तो देखा आपने, अपने कौशल. मेहनत और लगन से आप किसी भी उचाई को छु सकते हो। 

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