मूर्तिकार – Sculptor

नदी किनारे बसे छोटे से गाँव में एक मूर्तिकार अपने परिवार के साथ रहता था। उसके परिवार में थी उसकी पत्नी और एक प्यारी सी बिटिया। दिन भर मूर्तियां बनाता और शाम को नदी किनारे टहलते हुए मीलों दूर निकल जाता। 
ठंडी ठंडी हवा के झोंके और चारों तरफ फैली हरियाली उसका मन मोह लेती। ये वही समय होता जब मूर्तिकार अगले दिन मूर्ती के नए रूप की कल्पना करता। और फिर उसी मूर्ति की कल्पना में डूबा वह अपने घर वापिस चल पड़ता। 

अगले दिन उस कल्पना की आकृति को पत्थरों में तराशता। भिन्न-भिन्न आकार की मूर्तियां बनाना ही उसके जीवन का मात्र उद्देश्य था। उसकी बनायीं गयी मूर्तियों को देखने और खरीदने लोग दूर से आते थे। उसके हाथ से बनी उन कलाकृतियों को निहारते हुए सब मंत्र मुग्ध हो जाते। उसकी कला की प्रशंसा सुन और ख्याति देख वह मूर्तिकार भी गद-गद हो जाता। 

बात उस दिन की है जब बारिश अपनी चरम सीमा पर थी। लगता था मानो उस दिन तो प्रलय ही आने वाली थी। बारिश की तेज बौछार और ऊपर से नदी किनारे फिसलन, मूर्तिकार को टहलने से रोकने के लिए काफी थी। मूर्तिकार तो शायद रुक भी जाता मगर प्रकृति के इस वास्तविक रूप से सजी पृथ्वी को देकने की लालसा उसके काल्पनिक मन को रोक न पायी। 
हाथ में काला छाता लिए, पैरों को थोड़ा जमा कर रखते हुए मूर्तिकार कुदरत के नजारों को देखता हुआ नदी किनारे चल निकला। लेकिन बारिश तो बारिश अब तो तेज हवा भी चलने लगी थी। उस तेज आँधी में तो उसको अपना छाता संभाल पाना भी मुश्किल हो रहा था। 
तेज आंधी से बचने के लिए एक थोड़े ऊँचे बने टीले के पास जा रुक गया ताकि टीला तेज हवा से उसका बचाव कर सके। तभी टीले से लुढ़कता हुआ एक पत्थर नीचे आया और इसके पास आकर रुक गया। तेज बारिश के कारण वो पत्थर पूरी तरह से धुल चुका था। 
दूध से भी ज्यादा सफेद पत्थर देख मूर्तिकार का काल्पनिक मन जाग गया। उसके मन में विभिन्न कल्पनाएँ जनम लेने लगी। मगर सब कल्पनाओं को पीछे छोड़ एक आकृति उस मूर्तिकार के मन में छा गयी। उसने वही निश्चिय किया कि कल सुबह इस पत्थर से वो देवी माँ की मूर्ती की रचना करेगा। यह विचार  आते ही उसने उस पत्थर को उठा लिया और घर की तरफ चल पड़ा। 
अगले दिन बारिश का प्रकोप कुछ कम हुआ, मंद-मंद हवा चल रही थी, मौसम सुहावना और लुभावना था और यह सब अनुभव कर मूर्तिकार का मन प्रसन्न हो गया। उस आनंदमय मनोदशा के साथ उसने उस पत्थर को उठाया और उस पर अपनी नक्काशी करना शुरु कर दिया। 
पहले हथोड़े की चोट पर ही समझ गया कि इतनी आसानी से ये नहीं टूटेगा। उसने और जोर से हतोड़ा मारा मगर पत्थर था के तस से मस न हुआ। थोड़ा आशर्यचकित तो हुआ मगर फिर कोशिश करने लगा। जब देखा कि पत्थर का तो एक अंश भी नहीं हिला तो उसने अपनी सब से पैनी छैनी निकाली। मन ही मन यह सोचते कि अब तो पत्थर टूट ही जाएगा उसने फिर हतोड़े से पत्थर पर वार किया। मगर पत्थर तो मानो उस की नाकामयाबी पर मुस्करा कर उसे चिढ़ा रहा था। 
अपने प्रयत्न विफल होते देख उसका मन बेचैन और दिमाग थोड़ा गरम हो गया। बिना सोचे समझे उसने पहले से भी बड़ा हथौड़ा लिया और दे दना-दन उस पत्थर पर वार करने लगा। कभी उसके ऊपर मारता तो कभी नीचे की तरफ। मगर पत्थर था जैसे उसे हराने पर तुला था। मूर्तिकार अँधा धुंध उस पत्थर पर हथौड़े बरसा रहा था मगर कोई भी असर न हुआ। बेचारा पसीने पसीने हो गया मगर उसके हथोड़ों की मार कम न हुई। लग रहा था कि मूर्तिकार अपनी कला की मर्यादा को भूल, मात्र एक पत्थर तोड़ने वाले की भूमिका में परिवर्तित हो गया हो। काफी मेहनत के बाद भी जब पत्थर न टूटा तो मूर्तिकार थक हार कर बैठ गया और मन ही मन निश्चय कर लिया कि इस पत्थर को बाहर फ़ेंक देगा। 
हथौड़ों की इतनी आवाज सुन घर में बैठी उसकी बेटी को हैरानी हुई। हमेशा तो पिता शांति से बिना कोई आवाज किए मूर्तियाँ बनाते थे मगर आज ऐसा क्या हो गया जो इतना शोर हो रहा है। ये देखने कि सब ठीक है वह उठी और पिता की कार्यशाला की तरफ चल दी। 
पिता को एक सफ़ेद पत्थर के पास थका-हारा बैठा देख कर वो समझ गयी कि सामने पड़ा सफ़ेद पत्थर नहीं टूट रहा जिसकी वजह से पिता परेशान हैं। पिता को इतना बेचैन और परेशान देख उसका मन भारी सा हो गया। सोच में पड़ गयी कि कैसे वो पिता की मदत कर सकती है। तभी उसके दिमाग ने एक करवट ली और उसने वहां पड़ा हथौड़ा अपने हाथ में उठा उस पत्थर पर दे मारा। 
अरे, ये क्या, पत्थर तो टूट गया। पत्थर के टूटने की आवाज से अपनी सोच में डूबा मूर्तिकार भी उठ खड़ा हुआ। अचंभित नज़रों से कभी बेटी को देखता तो कभी उस टूटे हुए पत्थर को। अपनी आँखों पर विशवास नहीं हो रहा था। मूर्तिकार सोचने लगा कि मैंने लाख कोशिश की लेकिन ये पत्थर हिला तक नहीं और बेटी के एक हथौड़े ने इसे तोड़ डाला। 
अचानक मूर्तिकार को बात समझ में आ गयी। 
मूर्तिकार ने उस पत्थर पर न जाने कितने वार किए और उसके न टूटने पर थक-हार कर बैठ गया। उन वारों ने इस पत्थर को हिला तो दिया था मगर पूरा तोड़ने के लिए सिर्फ एक आखिरी वार की जरूरत थी, जो उसकी बेटी ने लगा दिया। 
तभी कहते हैं कि कोशिश करते रहो और कभी हार न मानो,
न जाने भगवान् कब उसका फल दे दें। 

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