पैसे की अहमियत

सूरजभान के पिता की मृत्यु के बाद उनकी सारी धन दौलत और हवेली का वह अकेला वारिस था। पिता की मौत की खबर सुन न जाने कितने लोगों ने आकर उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि दी, सूरजभान के दुःख के समय में उसका साथ दिया। 
पिता द्वारा छोड़ी संपत्ति का हिसाब लगाया तो उसकी समझ में आया कि वो अब कितना धनि हो गया है। उसे लगने लगा कि इतनी धन दौलत के होते उसे कुछ भी काम करने की कोई ज़रूरत ही नहीं। 
बस फिर क्या था। शाम होते ही उसके घर में यार-दोस्तों की महफ़िलें लगने लगी। नाच-गाना, मदिरा पान और रात भर खूब दावतें उड़ाई जाने लगी। यार-दोस्तों का वह हीरो सा बन गया था। हर कोई उसकी चापलूसी करता और उससे कोई न कोई फायदा उठाने लगा। इतनी सरलता सी मिली दौलत को लुटाने में उसे थोड़ा भी दुःख नहीं होता था।   
आखिर, कितने दिनों तक चलती यह धन दौलता की बौछार, एक न एक दिन तो भरा हुआ कुआँ भी खाली हो जाता है। जब धन दौलत की कमी की वजह से महफ़िलें कम होने लगी तो यार-दोस्तों का जमावड़ा भी छटने लगा। चापलूस दोस्त गायब हो गए, जब पैसा ख़तम तो दोस्ती के भार को कौन कन्धा देता। 
और एक दिन ऐसा भी आया जब शाम बिताने के लिए सिर्फ सूरजभान अकेला ही रह गया। कोई दोस्त यार नहीं, कोई महफ़िल नहीं, कोई पकवान नहीं, कोई नाच गाना नहीं, कोई लोगों के ठहाकों की गूँज नहीं। और तो और, सालों सजी रहने वाली हवेली तक में कोई दीपमाला नहीं। 
कमरे में गुमसुम सा अकेला बैठा सूरजभान इस समय इतने सालों की बनावटी जिंदगी के बारे में सोच रहा था। पिता की मेहनत से कमाई धन दौलत को इस तरह बेदर्दी से लुटा देना का गम उसे सता रहा था। किस तरह दोस्तों-यारों के दिखावटी चेहरों ने पलटा खाया, यह उसके मन को कांटे की तरह चुभ रही थी। यह याद कर आँखों में आंसू आ गए कि कल तक चापलूसी करने वाले कैसे उससे कतराने लगे थे। उसे अपने यार-दोस्तों से ऐसे धोखे की बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी। 
सब कुछ तो लूट गया था, लेकिन हवेली तो अभी उसकी ही थी। कभी मन में आता कि इसे बेच कर कोई कारोबार कर ले। मगर कारोबार क्या करे, और फिर कारोबार सफल होगा कि नहीं, यह कौन जनता है। दूसरी तरह यह डर भी उसे सताने लगा कि कहीं पिता की आखरी निशानी को बेच कर वह पूरी तरह से दिशाहीन ही न हो जाए। हवेली रहेगी तो मानो पिता का आशीर्वाद भी मिलता रहेगा। 
तभी, एक दिन रात को सपने में उसके पिता ने उसे दर्शन दिए और बोले ” लगता है सब गवा कर होश आया है तुझे। अरे, यह यार-दोस्त और चापलूस तो अपने होते ही तब तक है जबतक तेरी जेब में रूपया पैसा होगा। ” उसने सपने में अपने पिता के पैरों से लिपट कर क्षमा मांगी और आगे से इन सब बातों को अपने जीवन का आधार मानने का वादा किया। पिता ने भी सपने में ही उसे गले लगाया और जाते हुए बोले ” हवेली के तहखाने में जाओ, वहां बहुत सी धन दौलत पड़ी है। लेकिन याद रहे वह सब लोगों की भलाई के काम करने में ही इस्तेमाल हो। ” इतना सुनते ही सूरजभान का सपना टूट गया। 
आंखें मलते हुए उठा तो भोर हो चुकी थी। उसके चेहरे पर दुविधा साफ़ दिख रही थी, क्या यह मात्र एक सपना था या असल में पिता का आशीर्वाद था। इसी उलझन में पड़े हुए उसने तहखाने की चाबी और एक टोर्च अलमारी से निकाली और सालों से बंद तहखाने की तरफ चल दिया। 
तहखाने के दरवाजे और ताले पर धूल के साथ मकड़ियों का जाला भी लगा हुआ था। किसी तरह उसने साफ़ कर ताला खोला और अंदर दाखिल हुआ। अँधेरे के कारण उसे ठीक से दिखाई भी नहीं दे रहा था। उसने जेब से टोर्च निकाल कर जब जलाई तो सामने पड़े एक बक्से पर नज़र पड़ी। बक्सा खोला तो सूरजभान का मुंह खुला का खुला रह गया। इतनी दौलत घर में थी जिसका उसे पता ही नहीं था। पिता को याद कर उसने फिर एक बार वादा दोहराया कि इस सारी धन दौलत को वह सिर्फ और सिर्फ जरूरतमंदों की मदत करने में ही इस्तेमाल में लाएगा। 
एक बार फिर से सूरजभान दौलतमंद हो चुका था, लेकिन एक बदलाव के साथ। उसने न तो हवेली की साज सजावट में कोई पैसा खर्चा और न ही कोई दोस्तों की महफ़िल सजाई। बनावटी देखावे से उसे नफरत सी हो गयी थी। ऐशोआराम की जिंदगी वह त्याग चुका था। 
काफी सोच विचार करने के बाद सूरजभान ने पूरी की पूरी हवेली में एक हॉस्पिटल खोल दिया। नामी डॉक्टर वहां मरीजों का मुफ्त इलाज करते। जिस रोगी को हॉस्पिटल में भर्ती किया जाता उसके साथ आये परिवार के लोगों के रहने की भी व्यवस्ता की गयी। दवा, सर्जरी, और खाना सब मुफ्त था। कभी किसी से कोई भी पैसा नहीं लिया जाता था। रोगियों को बिना खर्चे के ठीक होता देख रोगियों की संख्या भी बढ़ने लगी। दूर दूर से लोग वहां मुफ्त इलाज़ करवाने आते और ठीक हो कर सूरजभान को दिल से आशीर्वाद देते।
सूरजभान की दूसरों के दर्द हरने की लगन देख बहुत से बड़े-बड़े कारोबारियों ने हॉस्पिटल को चंदा देना शुरू कर दिया। उस चंदे से सूरजभान ने इलाज़ में काम आने वाले बहुत से नए उपकरण मंगवाए जिससे मरीजों का इलाज और बेहतर तरीके से हो सके। हॉस्पिटल की लोकप्रियता और कुशलता को देख सरकार की तरफ से भी सालाना अनुदान दिया जाने लगा। 
इस तरह, महफिलों से गूंजती हवेली को गरीबों की सेवा का माध्यम बना कर सूरजभान ने अपने पिता से सपने में किया वादा निभाया। जब कोई बुजुर्ग सूरजभान के सर पर हाथ रख के उसे आशीष देता तो सूरजभान को लगता जैसे उसके अपने पिता ने उसके सर पर हाथ रख दिया हो। 
याद रहे, धन दौलत की अहमियत वही जानता है जिसके पास उसका अभाव हो। चापलूसों से होशियार रहे और अपनी दौलत का उपयोग किसी उपयुक्त और प्रगतिशील कार्य के लिए करें। विलासिता को छोड़ अपना धन और समय किसी हीन के दुखों को हरने में लगाएं, आपके मन को सच्चा सुख मिलेगा। 

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