पिताश्री के अनमोल वचन

दुनिया भर में चलते वित्तीय संकट के समय बहुत सी कम्पनिओं को अपना घाटा कम करने के लिए कर्मचारिओं की छटनी करनी पड़ी। निकाले गए कर्मचारी भी दुविधा में पड़ गए कि अब करें तो क्या, क्योंकि इन दिनों नौकरीओं का भी अकाल पड़ जाता है। अच्छी नौकरी मिलती नहीं और जो मिलती है वहां पगार कम मिलती है। 

हमारे मित्र, प्रेम, भी इस छटनी की चपेट में आ गया। प्रेम की नौकरी क्या गयी उसका तो मानो संसार ही उजड़ गया था। 
दिन भर कमरे में गुमसुम बैठा रहता और रात को जब सब सो जाते तो उल्लुओं की तरह जागता और कमरे के चक्कर लगाता रहता। न खाने-पीने की सुध और न ही किसी से कोई बातचीत। माँ, भाई, बहनों और यार दोस्तों ने बहुत समझाया कि अब पिछली नौकरी का सोचना छोड़ दूसरी नौकरी तलाश ले। 
लेकिन प्रेम महाशय पर उसका कोई असर न होता। जो भी उससे बात करता बस उस की तरफ मुँह लटका कर देखता रहता, एक शब्द भी नहीं बोलता। चार दिन से शेव नहीं की थी, नहाना तो छोड़ो मुँह तक ढंग से नहीं धोया था। आँखों में गड्ढे से पड़ गए थे, ऐसा मानो जैसे कोई साल दो साल का मरीज हो। 
तभी हफ्ते भर जयपुर के दौरे पर गए उसके पिताश्री लौट आए। घर का माहौल देखते ही समझ गए कि मामला कुछ गंभीर है। पूरी बात सुनी तो पता चला कि प्रेम की नौकरी छूट गयी है। उसके मन के हालात जानते ही उन्हें भी दुःख हुआ लेकिन उन्होंने इतना भी नहीं कि वह भी प्रेम की तरह गुमसुम हो जाते। अनुभवी थे, जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे थे उन्होंने। 
कुछ देर बाद घर के सारे सदस्य प्रेम के कमरे में पहुंचे। एक हफ्ते से बाहर गए पिता ने प्रेम से पुछा ” अरे, कैसा है तू, मैं एक हफ्ते बाद घर आया और तू मिलने भी नहीं आया। ” पिता के यह नाराज़गी भरे बोल सुन प्रेम थोड़ा शर्मिंदा सा हुआ और बोल पड़ा ” नहीं पापा, ऐसा कुछ नहीं, बस ज़रा तबियत थोड़ी ढीली सी थी। ” घर वालों ने भी चैन की सांस ली, चलो प्रेम बोला तो सही। 
तब पिता ने सबके लिए नाश्ता वहीँ लाने को कहा और अपने टूर के किस्से सुनाने शुरू कर दिए। कभी गुप्ता जी की बात करते तो कभी शर्मा जी की, कभी जयपुर के बारे में बताने लगते। बातों-बातों में उन्होंने एक चुटकुला सुनाया, सुनते ही सब खिलखिला के हंस पड़े। उस चुटकुले हो सुन प्रेम भी अपनी हंसी नहीं रोक पाया। 
पिताश्री ने फिर अपने जयपुर के दौरे की बातों के दौरान वही चुटकुला दुबारा सुना दिया, प्रेम सहित सब हंस पड़े। फिर उन्होंने बातों का रुख अपने जयपुर के दौरे की तरफ कर दिया। वहां यह किया, वहां इस से मिले, वहां यह खाया, वहां यह नयी जगह देखी और इन बातों के दौरान फिर तीसरी बार वही चुटकुला दोहरा दिया। कोई नहीं हंसा, बस सब टकटकी लगाए उनकी तरफ देखने लग गए। तब प्रेम बोल उठा ” यह क्या बार-बार वहीँ घिसा पिटा चुटकुला सुनाए जा रहे हैं आप। “
पिताश्री ने बड़े ही भोलेपन से पुछा ” क्यों, क्या हंसी नहीं आयी। ” तो सब ने कहाँ तीसरी बार नहीं आयी। तब पिता ने प्रेम की तरफ देख कर कहा 
” कितनी अजीब बात है, मेरे चुटकुले पर तुम्हे हंसी तो आयी पर जब दोबारा और तीसरी बार सुनाया तो हंसी गायब हो गयी। हंसी के पल तो आप सब ने हंसी में उड़ा दिए और उसे बार-बार जीना नहीं चाहते। तो फिर गम के पल बार-बार क्यों जीना चाहते हो। अच्छे पल को जी कर इंसान आगे बढ़ जाता है उसी तरह, गम के पलों को क्यों अपने सीने से लगाए रखते हो। जो हुआ सो हुआ, उसे भूल अपने सामने पड़े जीवन की सोचो। “
प्रेम समझ गया कि पिता का इशारा किस ओर है। उसने भी अपने गम को भुला नयी नौकरी की तलाश शुरू कर दी। 
मित्रों, जीवन में उतर चढ़ाव तो आते रहते हैं। हमें उनसे सबक लेना चाहिए
और आने वाले समय में पहले से भी अच्छा करने की कोशिश करनी चाहिए।

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