दो भाइयों की कहानी

सड़क दुर्घटना में माता-पिता की मृत्यु के बाद मोहन और सोहन अनाथ हो गए। न कोई भाई-बहिन या रिश्तेदार था जिन्हे दोनों अपना कह सकते। सिर्फ एक दुसरे का सहारा ही बचा था। मोहल्ले के लोग तो थे लेकिन वह तो सिर्फ सुख-दुःख में ही काम आ सकते थे मगर उनके माता-पिता की जगह तो ले नहीं सकते थे। घर गृहस्ती और अपना भविष्य तो उन दोनों को खुद ही संभालना था। 

मोहन उम्र में सोहन से सिर्फ दो साल हो बड़ा था, लेकिन अपने बड़े होने के फर्ज़ को समझते हुए उसने घर का सारा भार अपने कंधो पर उठा लिया। उसने सोहन से अपनी पढ़ाई जारी रखने को कहा और अपनी पढाई छोड़ एक सेठ की दुकान पर काम करने लगा। उस काम के बदले सेठ उसे कुछ रूपए और खाने पीने का सामान दे देता। खाने पीने का सामान उनके पेट भरने के काम आता और जो रूपए मिलते वो सोहन की पढ़ाई में लग जाते। 

दिन बीतते गए और मोहन को भी अब सेठ से अच्छी पगार मिलने लगी थी। उस पगार के कारण घर में खाने-पीने की कमी नहीं थी, और न ही कभी मोहन ने कभी सोहन की पढाई के खर्चे में कोई कमी आने दी। सोहन ने स्कूल की पढाई ख़तम कर जब कॉलेज जाने की इच्छा जताई तो मोहन ने फ़ौरन हाँ कर दी। हालांकि, मोहन की पगार इतनी भी नहीं थी कि वो कॉलेज की फीस आराम से भर सकता, लेकिन उसने ठान लिया कि वो दूकान से छुट्टी होने के बाद कोई दूसरा काम भी पकड़ लेगा जिससे कुछ और आमदनी हो सके। मोहन किसी भी हालात में सोहन की पढ़ाई में कोई बाधा नहीं आने देना चाहता था। 
सोहन ने कॉलेज में दाखिला क्या लिया उसकी तो दुनिया ही बदल गयी। नए दोस्तों के साथ बहुत कुछ नया सीखने को मिला। नए दोस्त हर वर्ग के परिवारों से आए थे, कोई धनि तो कोई मध्यमवर्गी तो कोई उसकी अपनी तरह निर्धन। एक टोली सी बन गयी थी जिसमे न पैसे का दबदबा था और न ही किसी के बाप का रुतबा अपना असर दिखाता था। इस ग्रुप में सिर्फ चलता था तो सिर्फ ज्ञानता का प्रभाव। इसी कारण सोहन की बहुत लड़कों से घनिष्ट मित्रता हो गयी थी। 
उधर, मोहन जी तोड़ मेहनत कर रहा था। सेठ की दुकान बंद होने के बाद वहीं बाहर मेज लगा कर चाय बेचने लगा। इस धंधे से भी कुछ कमाई हो जाती जो सोहन की फीस देने में काफी सहायक होती। अक्सर रात के 11 बजे अपनी चाय की दुकान बंद कर वो जब घर लौटता तो सोहन को सोया पाता। कई दिनों से तो दोनों में कोई बातचीत भी न हो पायी थी। सुबह 5 बजे उठ घर का सारा काम करना पड़ता और फिर 8 बजे सेठ की दुकान खोलनी होती थी। मोहन सुबह ही दोनों वक़्त का खाना बना लेता। वह नहीं चाहता था कि घर के काम करने की वजह से सोहन की पढ़ाई में कोई बाधा पड़े। 
वक्त बीतने लगा और अब सोहन का कॉलेज में तीसरा साल चल रहा था। मोहन ज्यादा तो नहीं पढ़ पाया था लेकिन उसे इतना पता था कि कॉलेज की पढाई 3 साल में पूरी हो जाती है। उसके बाद आगे पढ़ो या फिर ग्रेजुएट होने के बाद नौकरी करो। 
इतने साल सुबह 5 बजे से रात 11 बजे तक बिना रुके काम करने से वो थक सा गया था, स्वास्थ भी कुछ ठीक नहीं रहने लगा था। फिर भी किसी न किसी तरह वह सोहन के कॉलेज ख़तम करने तक अपने किसी भी काम को छोड़ नहीं सकता था। उसके मन में था कि सोहन कॉलेज ख़तम कर कोई नौकरी कर लेगा तो उसे भी कुछ राहत मिलेगी। 

और फिर एक दिन कॉलेज के नतीजे भी निकल गए। शाम को वह बहुत खुश था, उसने आज अपनी चाय की दुकान भी नहीं लगाई। सोहन के मन पसंद मिठाई हाथ में ले घर चल पड़ा। सोचा, घर पहुँचते ही सोहन का इस मिठाई से मुँह भर दूंगा और फिर गले लगा बहुत सा आशीर्वाद दूंगा। और यह सोच कि सोहन भी खुश हो मेरे गले लग जाएगा। अपने इन सपनों की दुनिया में खोया हुआ वह घर में दाखिल हुआ। 
” सोहन, सोहन”, ” अरे सोहन कहाँ छुपा बैठा है।” लेकिन घर में तो सिर्फ सन्नाटा था। घर खाली था, सोचा शायद दोस्तों के साथ ख़ुशी मनाने निकल गया होगा। मिठाई मेज पर रख हाथ मुँह धोया, सुबह का बना खाना गरम किया और इंतज़ार करने बैठ गया अपने भाई सोहन का। 
शाम ढलने को हुई तो मोहन कुछ चिंतित सा हो गया। क्या सोहन को नहीं पता था कि मैं उसका इंतज़ार कर रहा हूँगा। अजीब लड़का है, दोस्तों के चक्कर में भाई को ही भूल गया, मगर ये सिर्फ अपने दिल को समझाने की लिए ही सोचा था। उसके अंदर तो रह-रह कर कई बुरे खयाल भी आ रहे थे। कई बार तो घर से निकल गली के मोड़ तक भी देख आया लेकिन सोहन दूर-दूर तक दिखाई नहीं दिया। 
कुछ देर बाद एक पुलिस जीप घर के बाहर रुकी। पुलिस को देख मोहन के पसीने छूट गए। हो न हो सोहन की कोई बुरी खबर ही होगी। सोचते ही उसका दिल बैठने लगा और सर चकराने लगा। तभी पुलिस वालों ने दरवाजे पर थपथप की तो बड़ी मुश्किल से उठ कर मोहन ने दरवाजा खोला। 
सामने पुलिस की वर्दी में एक अफसर को देख उसने हाथ जोड़ पूछा कि उसका भाई तो ठीक है। पर जवाब देने के बदले वो अफसर के पीछे खड़े एक नौजवान ने नीचे झुक कर मोहन के पैर छुए। मोहन ने डरते हुए उस को कंधों से पकड़ कर उठाया तो हैरान रह गया। सामने उसका अपना सोहन खड़ा था। 
मोहन तो उसे देख कुछ समज ही न पाया, बस डरते हुए इतना ही निकला उसके मुँह से “साहब, इसने क्या किया है।” 
सोहन के साथ खड़े अफसर ने तब मोहन को बताया कि इसने वोह किया है जो हर कोई नहीं कर सकता। सोहन कॉलेज के साथ-साथ पुलिस में भर्ती होने की तैयारी भी कर रहा था। आज कॉलेज के साथ उसकी पुलिस भर्ती का नतीजा भी आया है और सोहन दोनों में बहुत ही अच्छे नंबरों से पास हुआ है। 
इतना सुनना था कि मोहन ने आगे बढ़ सोहन को गले लगा लिया। दोनों के नेत्रों से अश्रु गंगा बहने लगी। अफसर की भी उनका भारत-मिलाप देखते हुए आँखें नम हो गयी। 
सोहन ने तब उस अफसर से कहा ” सर, ये मेरे बड़े भाई नहीं बल्कि भगवन तुल्य पिता हैं। जितनी जी-जान से इन्हों ने मेरी परवरिश की है, मैं तो क्या दुनिया का कोई भी भाई अपने को सबसे भाग्यशाली समझेगा। मेरा तन मन सब न्योछावर हो जाए तो भी मैं कभी इनका ये एहसान सात जन्मों तक भी नहीं उतार पाऊंगा।” और इतना कहते ही सोहन फिर रो पड़ा और मोहन से लिपट गया। 
और फिर, अफसर ने सोहन को कल से ट्रेनिंग कैंप में समय पर पहुंचने को कहा और जीप में बैठ चल दिया। 
अफसर के जाने के बाद सोहन ने भाई को बताया कि किस तरह देर रात जाग और सुबह जल्दी उठ कर उसने कॉलेज और पुलिस की भर्ती की तैयारी की। और उसने ये भी बताया कि 3 महीने की ट्रेनिंग के दौरान उसे वजीफा भी मिलेगा और ट्रेनिंग ख़तम होते ही पक्की नौकरी। 
” और मेरे भाई, आज से आप कोई चाय की दूकान नहीं लगाओगे और न ही कोई नौकरी करोगे। आप सिर्फ आराम करोगे और आज के बाद आपके कन्धों का सारा बोझ मेरे कन्धों पर।”
इतना कुछ इतनी जल्दी हो गया कि मोहन भूल ही गया कि मिठाई तो अभी मेज पर ही पड़ी है। लपक कर उसने मिठाई का डब्बा खोला और 2-3 टुकड़े एक साथ सोहन के मुँह में ठूस दिए। और दोनों ख़ुशी से पागल से हो एक दूसरे के गले लग गए। 
 
समय कितना भी कठिन क्यों न हो,
एक दुसरे का सहारा और हिम्मत उसे आसान बना देता है।
 

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