दोस्ती का दर्द-Hindi Kahani

दोस्ती का दर्द
जब इंसान इस दुनिया में कदम रखता है तो ना जाने कितने रिश्ते साथ जुड़ जाते हैं। चाहो या मुँह मोड़ लो मगर रिश्तेदारी कभी ख़तम नहीं होती। लेकिन एक रिश्ता ऐसा भी है जो जीवन भर साथ निभाता है। अरे, मैं बीवी नहीं, दोस्त की बात कर रहा हुँ। वो लोग भाग्यशाली होते हैं जिन्हे असली दोस्त मिल जाए। दोस्त हर घड़ी तुम्हारे सँग होगा, दुःख हो या सुख वो एक चट्टान की तरह अडिग खड़ा मिलेगा। 
 
 
ये कहानी एक ऐसी दोस्ती की है जो वक़्त की मार के आगे भी नहीं झुकी। इसी आखिरी तक पढ़िएगा क्योंकि अंत ही दोस्ती का असली मतलब दर्शाता है। 
 
 
मुझे आज भी याद है वह पल जब उमेश पहली बार मुझे कॉलेज की कैंटीन में मिला था। १९६८ की ठंडी दोपहर और बाहर सूर्य देवता नदारद थे। हलकी बारिश और तेज हवा के कारण ठण्ड से हड्डियाँ तक सुन्न हो गयी थी। जिसे देखो कैंटीन की तरफ लपक रहा था और एक ही सुर में ” छोटू, कड़क चाय ला ना ” का नारा लगा रहा था। छोटू परेशान, मगर दौड़ कर चाय का गिलास हाथ में थमा किसी दूसरे की तरफ दौड़ जाता। 
 
 
उसने मेरे सामने पड़ी मेज पर मेरा चाय का गिलास रखा ही था कि पास खड़े एक स्टूडेंट ने उसे उठा चाय की चुस्की लेना शुरू कर दिया। अजीब बात है, चाय मेरी और बिना जान पहचान और मुझसे पूछे बिना कैसे कोई मेरी चाय ले सकता है। ” अबे ओए, ये मेरी चाय है।” यह सुनते ही उसने चाय का गिलास नीचे रख दिया और बहुत ही नरम आवाज में बोला ” सॉरी भाई, मैं समझा वो मेरे लिए चाय रख गया है। कोई नहीं, मैं अभी आपके लिए दूसरी कड़क चाय मंगवाता हूँ । ” और उसने छोटू को एक कड़क चाय लाने को आवाज दी।  
 
 
और चाय के जाम टकराने के बाद हम दोनों अच्छे दोस्त बन गए। यहाँ तक कि हम दोनों ने एक ही कमरा कॉलेज के पास किराये पर ले लिया और इक्कट्ठे रहने लगे। पूरे तीन साल में पढ़ना कम और मस्ती ज्यादा करते रहे। कभी फिल्में देखना, कभी घूमने कनाट प्लेस पहुँच जाना और कभी अपने रूम में बैठ के घंटों बियर का मजा लेना। वक़्त बीतता गया और किसी तरह हम दोनों ने ग्रेजुएशन पूरी की। अब कितने नंबर से पास हुए मत पूछना, क्योंकि बता दिया तो हम तो नहीं पर आप जरुर शर्मिंदा हो जाओगे। 
 
 
हम दोनों ने खूब कसमें खाई कि अपने अपने शहर जा कर भी एक दूसरे के टच में रहेंगें। और फिर वो दिन भी आगया जब हमने दिल्ली छोड़ अपने अपने शहर की ट्रैन पकड़ी ली। सारी रात कान में छुक छुक गाड़ी की आवाज थी और मन में मेरे और उमेश के एक साथ बिताए हुए खूबसूरत पल। 
 
 
समय बीतता गया और मुझे अपने ही शहर में और उमेश को लीबिया में नौकरी मिल गयी। एक दूसरे को खत लिखते और उसका जवाब आने का इंतज़ार करते। फ़ोन करना बहुत महँगा था इसलिये बात नहीं होती थी। हम दोनों खुश थे और हमारे माँ बाप हमारी शादी के सपने देखने लगे। 
 
 
इसी बीच एक लड़की से मेरा रिश्ता पक्का हो गया और दो महीने बाद शादी। ये खुशखबरी मैंने फ़ौरन खत से उमेश को भेजी और साथ में लिखा कि साले मेरी शादी के लिए कम से कम दस दिन की छुट्टी ले कर पहुँच जा। और दो तीन दिन बाद उसका जवाब मिला ” शादी मुबारक, दस दिन क्या तू कहे तो नौकरी छोड़ कर आ सकता हूँ। नो चिंता, मैं शादी से बहुत पहले पहुँच जाऊँगा।” और मेरा मन ख़ुशी से भर आया, दोस्त हो तो उमेश जैसा। तीन चार साल से हम मिले नहीं थे इस लिए इस ख़ुशी के मौके पर उसे गले लगाने का बहुत मन कर रहा था। 
 
 
शादी से ठीक एक महीना पहले मैंने उसे अपनी शादी का कार्ड भी भेज दिया। कार्ड मिलने के बाद जब भी उसका खत आता तो उसमे वो मेरी होने वाली पत्नी के बारे में पूछता रहता और मुझे उसे खुश रखने की सलाह देता रहता। कहता, शादी एक पवित्र बंधन है जिस में दो लोग पर आत्मा एक हो जाती है। 
 
 
आखिर शादी को जब सिर्फ दस दिन रह गए तो मैंने फिर उसे लिखा कि ” नौकरी छोड़ने की बातें करने वाले अभी तक पहुँचा नहीं।” उसका जवाब आया कि तीन दिन बाद की फ्लाइट से इंडिया आ रहा हूँ, जल्दी मिलते हैं। उसने अपना फ्लाइट नंबर और लैंडिंग टाइम भी लिख दिया था। मेरी ख़ुशी की ठिकाना नहीं था। आखिर पूरी जिंदगी में एक ही तो दोस्त बनाया था मैंने। 
 
 
तीसरे दिन, मैं तैयार हो उमेश को लेने एयरपोर्ट पहुँच गया और बहुत ही बेसब्री से इंतज़ार करने लगा। वक़्त बिताने की लिए एक कॉफ़ी पीता हुआ इधर उधर टहलने लगा। तभी घोषणा हुई कि उमेश की फ्लाइट लैंड कर गयी है। और कुछ देर बाद यात्री एक एक कर के बाहर आना शुरू हुए। जो कोई भी बाहर आता दूर से मुझे उमेश ही लगता पर पास आते ही मैं निराश हो जाता और दूसरे यात्री पर अपनी नज़र टिका देता। बहुत से लोग आ चुके थे और अपने दोस्तों, रिश्तेदारों के गले लग के खुश दिख रहे थे लेकिन मेरा दोस्त न जाने क्यों इतना समय लगा रहा था। एक घंटे तक मैंने अपनी आँखें उस रास्ते पर गड़ा दी थी जहाँ से उमेश चल कर आने वाला था। लेकिन, सब यात्री चले गए मगर उमेश का कहीं अता पता नहीं था। 
 
 
मैं काफी बैचेनी महसूस करने लगा कि उमेश कहाँ हैं। जब सारे यात्री एयरपोर्ट से जा चुके थे तो मैंने एयरलाइन के ऑफिस जा कर उमेश के बारे में पूछताछ की तो पता चला कि उमेश का नाम तो था लेकिन उसने फ्लाइट पकड़ी ही नहीं। सुनते ही मेरा मन घबराने लगा कि आखिर किस वजह से उमेश ने फ्लाइट नहीं ली। मेरे आग्रह करने पर एयरलाइन कर्मचारी ने लीबिया अपने ऑफिस फोन लगाया और वहां से भी यही जवाब मिला की उमेश नाम के यात्री का टिकट तो था लेकिन वो चढ़ा नहीं। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था लेकिन मन को तसल्ली दे कर कि शायद कोई जरूरी काम आन पड़ा होगा। यही सोचता हुआ अपने घर लौट आया। 
 
 
अगले दिन डाकखाने जा कर मैंने लीबिया में उसके घर का फ़ोन लगाया लेकिन घंटी बजती रही और किसी ने उठाया नहीं। उसके ऑफिस का फ़ोन नंबर मैंने कभी माँगा नहीं क्योंकि महँगे होने की वजह से हम एक दूसरे को फ़ोन करते ही नहीं थे। अब मेरा दिल घबराने लगा कि न उमेश आया, ना फ़ोन उठाया और न ही कोई खत। 
 
 
दुखी मन से मैंने एक खत उसे लिखा और पूछा की यह सब क्या है और वो केसा है। ४-५ दिन तक कोई जवाब नहीं आया तो मैंने एक खत उसके माता पिता को भी लिखा। लेकिन मेरी शादी के दिन तक दोनों तरफ से कोई सूचना नहीं मिली। मेरी ख़ुशी पर मानो दुःख के बादल से छा गए थे। 
 
 
खैर, शादी तो रुक नहीं सकती थी सो हो गयी, लेकिन ख़ुशी से ज्यादा दोस्त की नामौजूदगी मन में एक टीस सी छोड़ गयी। 
 
 
हर रोज़ मैं अपने दोस्त को याद करता और उलझन में पड़ जाता कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि ना तो उमेश आया और ना ही उसका कोई खत या खबर। 
 
 
मेरी शादी के एक महीने बाद जब मैं ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था और मेरी पत्नी मेरे लिए टिफ़िन लगा रही थी तो घर की घंटी बजी। ” ना जाने, ऑफिस जाने के वक़्त कौन आ गया ” बड़बड़ाता हुआ मैंने दरवाजे को खोला। सामने एक बुजुर्ग दम्पति खड़े थे। 
 
 
” बेटा, क्या आप राजीव हो।” मेरे हाँ कहने पर दोनों की आँखों में आंसू आ गए और भर्राई हुई आवाज में बोले “हम उमेश के माता पिता हैं।” 
 
 
मैं सन्न रह गया। जिसे मिलने के लिए मेरा मन जाने कब से तड़प रहा था वह खुद तो नहीं लेकिन उसके माता पिता मेरे सामने खड़े थे। शंकायों से घिरा मन लिए मैं उनके चरणों में झुक गया। बस फिर क्या था उनके मन का बाँध टूट गया और दोनों बुजुर्ग मुझे बाँहों में भर रोने लगे। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था। उन दोनों को ढाढस बंधाते हुए मैंने उन्हें सोफे पर बैठाया। इतने में मेरी पत्नी पानी ले आयी जिसे पी कर वो दोनों कुछ शांत हुए। 
 
 
जब वो थोड़े नार्मल हुए तो मैंने पूछा ” उमेश कहाँ है। ना तो वो खत का जवाब देता है और ना ही खुद लिखता है।” इतना पूछना था की दोनों के आंसू फिर बहने लगे। लेकिन अपने को सम्भाल कर उमेश के पिता बोले ” बेटा, तुम्हे क्या अब वो किसी को भी खत नहीं लिख सकता।” मेरे दिल की धड़कने तेज हो गयी और मैंने दबी सी आवाज में पूछा “मतलब।”
 
 
“वो अब हम सबको छोड़ कर चला गया है।”
 
 
यह सुनते ही मेरे पैरों तले मानो जमीन खिसक गयी हो, दिल रोने लगा लेकिन आंसू एक नहीं निकला, चक्कर सा आने लगा जैसे कोई भूचाल सा आ गया हो। शरीर ठंडा सा होने लगा जैसे उमेश नहीं मेरी मृत्यु हो गयी हो। और मैं धड़ाम से सोफे पर गिर पड़ा। ऑंखें सब देख रही थी पर छवि सिर्फ उमेश की ही दिख रही थी। 
 
 
मेरी पत्नी और दोनों बुजुर्गों ने मेरे हाथ पैर को सहलाया और मुझे पानी पीने को दिया। तब कहीं जा कर मुझे कुछ होश आया। होश आते ही मैं फूट फूट कर रोने लगा और अपने को कोसने लगा कि क्यों मैंने उसे अपनी शादी में आने का न्योता भेजा। क्या उसके आए बिना मैं शादी नहीं कर सकता था। मैं बड़बड़ाता रहा और दोनों बुजुर्ग अपना दर्द भूल मुझे ढाढस देने में लग गए। 
 
 
कुछ देर बाद उन्होंने ने बताया ” एक महीना पहले हमें उमेश की कंपनी से फ़ोन आया कि उमेश का एक्सीडेंट हो गया है और वो अस्पताल में है। कंपनी वालों ने हमारी टिकट्स का इंतेज़ाम किया और हम दोनों लीबिया पहुँच गए। जो लोग हमें एयरपोर्ट से लेने आए थे उनसे पता चला कि वो दस दिन की छुट्टी पर इंडिया जा रहा था। शायद हमें सरप्राइज करना चाहता था इस लिए हमें बताया ही नहीं।” “और जिस कार से वो एयरपोर्ट जा रहा था उसका एक ट्रक से एक्सीडेंट हो गया।” “और अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया।” 
 
 
” रोते बिलखते हम उसका मृत शरीर लेकर इंडिया आ गए और अंतिम संस्कार किया।” बाद में उसके सामान में तुम्हारा शादी का कार्ड देख हमें तुम्हारे घर का पता चला। 
 
 
दोस्तों, उमेश तो चला गया लेकिन मेरे दिल में एक खालीपन छोड़ गया जिसकी गहराईयों में डूब कर आज भी मैं उसको महसूस कर सकता हूँ। उससे बातें कर सकता हूँ। उसे छू सकता हूँ। 
 
 
इतने साल गुजरने के बाद भी आजतक मैं उमेश के माता पिता की पूरी सेवा कर रहा हूँ जैसा की उमेश खुद करता। शायद, यही है मेरी श्रद्धांजलि अपने प्रिय दोस्त उमेश को। 


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