दूर के ढोल सुहावने

राघव और वेद दोनों सगे भाई थे। एक ही माता-पिता की संतान होने के बावजूद दोनों के व्यवहार और चाल-चलन में जमीन आसमान सा अंतर था। 

 
वेद जहाँ पढाई-लिखाई में हमेशा आगे रहता था वहीं राघव को तो जैसे किताबों से नफरत सी थी। वेद न सिर्फ अपने माता-पिता की बल्कि पूरे मोहल्ले के बड़े-बुजुर्गों का आदर सम्मान करता था। लेकिन राघव ने कभी किसी को आदर देना और शिष्टाचार सीखा ही नहीं था। जब देखो बस अपनी तीखी जबान का प्रदर्शन कर अपने पर गर्व मेहसूस करता था। 
 
बचपन से जवानी में कदम रखते ही राघव को इस छोटे से शहर में अपना दम घुटता सा लगता था। उस पर एक माध्यम परिवार में पैदा होने का दुःख उसे सताता था। जब भी किसी चीज की फरमाइश करता तो सिमित आमदनी का बहाना बना माता-पिता मना कर देते। आखिर उन्हें भी तो घर में आती पगार के हिसाब से ही महीना भर घर का खर्चा उठाना होता था। लेकिन राघव तो जैसे इन सब बातों से बेखबर बस अपनी जरूरतों के पूरा न होने पर अपने ही माता-पिता को दोष देता रहता था। 
 
माता-पिता ने बहुत बार राघव को समझाया भी था कि वह अपने आचरण में सुधार लाए नहीं तो आगे चल कर बहुत दुःख उठाना पड़ेगा। लेकिन राघव कहाँ किसी की सुनने वाला था। दोस्तों यारों और सिनेमा के माधयम से बड़े शहरों की चमक-दमक उसे हमेशा अपनी ओर आकर्षित करती रहती थी। सिनेमा में दिखाए गए बड़े शहर के लोगों को अच्छे-अच्छे कपड़े पहने, बहुमंज़ली इमारतों में मीटिंग करते, पार्टी करते, पांच सितारा होटलों में खाना खाते या नयी-नयी गाड़ियों में घुमते देखा था। 
इन सब तड़क-भड़क वाली जिंदगी के सपनों को मन में संजोते हुए उसका तो जीवन में सिर्फ एक ही मकसद था। किसी तरह बड़े शहर, जैसे दिल्ली या मुंबई, चला जाए ताकि बाकी की जिंदगी मजे में बीते। 
अपने जेब खर्च से पैसे बचा बचा कर जो कुछ इकठे कर सका था बस वही लेकर घर से एक दिन राघव अपने सपनों की नगरी मुंबई की तरफ निकल पड़ा। चलने से पहले उसने एक चिट्ठी माता-पिता के लिए लिख गया था कि वह बड़े शहर जा रहा है, कहाँ कुछ नहीं लिखा। सुबह उठने पर सब परेशां की इस लड़के ने क्या किया। इधर-उधर पूछने से पता चला कि किसी ने उसे स्टेशन की तरफ जाते देखा था। बस, और कोई खबर किसी से नहीं मिली। 
उधर तेजी से भागती रेलगाड़ी में बैठा राघव इन सब बातों से अंजान अपने सपनों की दुनिया में खोया था। मुंबई पहुँचते ही वह सबसे पहले नए कपड़े खरीदेगा, आलिशान होटलों में खाना खाएगा, समुन्दर किनारे ठंडी हवा का आनंद लेगा। इन्ही सुनहरी पलों में अपना भविष्य देखते हुए जैसे ही कोई स्टेशन आता तो फ़ौरन ही अपने सहयात्रिओं से पूछने लगता ” मुंबई आगया क्या। ” रेलगाड़ी के उस डब्बे में बैठे सब यात्री अबतक जान चुके थे कि राघव पहली बार मुंबई जा रहा है। 
आखिर ट्रैन मुंबई सेंट्रल पर जब रुकी तो वहां लोगों की भीड़ देख एक बार तो चौंक सा गया। इतने लोग तो शायद उसके पूरे शहर में भी नहीं रहते थे। अपने बैग को कंधे पर लटका कर धीमी गति से वह स्टेशन से बाहर निकला और कभी इस सड़क अपर तो कभी दूसरी सड़क पर निकल जाता। ऐसा लगता था मानो आज ही सारा मुंबई घूम लेगा। कुछ देर बाद जब भूख लगी तो एक छोटे से होटल में जाकर भोजन किया। 
भोजन करने के बाद उसके पास सिर्फ 1200 रूपए ही बचे थे। इस महानगरी में तो इतने पैसे ज्यादा दिन नहीं चल पाएंगे, यह सोचते ही उसने सोचा कि क्यों न पहले रहने का इंतज़ाम किया जाए फिर नौकरी की तलाश करूंगा।
होटल वाले से रहने की जगह का पुछा तो उसने जो बताया वह सुन तो राघव के होश उड़ गए। मायूस सा होकर होटल वाले से कोई भी नौकरी दिलवाने को कहा। शायद होटल वाले को उस पर दया आ गयी। उसने ने उसे अपने यहाँ काम पर रख लिया। काम था किचन में हाथ बताना, साफ़ सफाई रखना, बर्तन मांजना इतियादी। पगार मात्र 3500 रूपए महीना मगर खाना पीना और सोने की जगह  मिलेगी। सोचा अभी इसे ही कर लेता हूँ, साथ-साथ कोई बड़ी नौकरी ढूंढ़ता रहूंगा। 
सुबह 5 बजे उठता, साफ़ सफाई करता और फिर सारा दिन किचन में कभी सब्जी काटता तो कभी बर्तन मांजता। रात को 12 बजे के करीब खाना खा कर सो जाता। फिर वही सुबह 5 बजे उठना पड़ता। यह क्रम पूरे 15 दिन तक चलता रहा। अब तक उसने न तो अपनी सपनों की नगरी मुंबई के दर्शन किए थे और न ही समुन्दर की लहरों को निहारने का मौका मिला था। थोड़ा सा खाली समय मिलता तो होटल के बाहर आ खड़ा होता और बहुमंजली इमारतों और आलिशान कारों के दर्शन कर लेता था। 
एक दिन छुट्टी लेकर वह सारा दिन दफ्तरों और दुकानों के चक्कर लगाता रहा कि कहीं कोई अच्छी नौकरी मिल जाए। लेकिन हर जगह उसे निराशा ही हाथ लगी। फिर कुछ दिन बाद यही किया तो बात समझ में आयी कि नौकरी एक होती है तो पाने वाले दस पहले ही खड़े होते हैं। नौकरी उसे ही मिलती है जिसका कोई जानने वाला हो। लेकिन उसे तो कोई भी इस शहर में जानता ही नहीं था। दिन भर घूमने के बाद रात वापिस होटल पहुंचा और सोने चला गया। 
बिस्तर पर लेटा ही था कि दिमाग में तरह तरह के विचार प्रकट होने लगे। क्या मैं इस होटल में काम करने के लिए अपने माता-पिता को छोड़ के भागा था, बड़े शहर में आने से क्या फ़ायदा हुआ, बड़ी-बड़ी करों को खरीदने और आलिशान घर में रहने के लिए पैसा कहाँ से लाऊंगा। मुझे इस महानगरी में बड़ी नौकरी कौन देगा, मैं तो यहाँ किसी को जानता तक नहीं। यह सब सोचते हुए उसको नींद आगयी। 
सुबह फिर वही 5 बजे उठा और साफ़ सफाई करते हुए रात भर मन में चल रहे विचारों के बारे में सोचता रहा। आखिर सुबह 9 बजे वह होटल मालिक के पास गया और नौकरी छोड़ने की बात कही। होटल मालिक एक दयावान प्रवर्ति का आदमी था।
उसने राघव को समझाया कि महानगरों की चमक-दमक से प्रभावित होकर न जाने कितने युवक युवतियां रोज़ मुंबई पहुँचते हैं। लेकिन इस चमक के पीछे बिछी धूल को नहीं देख पाते, उस संघर्ष से अनजान होते हैं जो उन्हें इस नगरी में रहने भर के लिए करना पड़ता है। लाखों में एक-आधा ही कुछ बन पाता है बाकी तो सिर्फ दाल-रोटी के चक्कर में ही फंस कर रह जाते हैं, जो उन्हें अपने छोटे शहर में रहते हुए भी मिल जाती।  
उस होटल मालिक ने राघव को 2000 रूपए दिए और वादा लिया कि वह अपने घर वापिस लौट जाएगा। उनकी कही बातों को सुन राघव ने उनके पाँव छुए और स्टेशन की तरफ चल पड़ा। जब यहाँ अपने सपने लेकर आया था तो मात्र 1200 रूपए उसके पास थे लेकिन आज जीवन की वास्तविकता का ज्ञान लेकर लौट रहा है तो 2000 रूपए हैं। यह तो कोई घाटे का सौदा नहीं रहा। वह मुस्करा उठा और ट्रैन में चढ़ गया। 

अपने शहर के स्टेशन पर उतर कर घर की ओर चल पड़ा। रास्ते भर माता-पिता और भाई से कैसे मिलेगा, बस यही सोचता रहा। घर पहुँच उसने जब दरवाजा खटखटाया तो माँ ने दरवाजा खोला। राघव को देख उनकी आँखों से ख़ुशी के आंसू टपकने लगे और उन्होंने आगे बढ़ कर उसे गले लगा लिया। अंदर पिता को खड़े देख राघव उनके पैरों से लिपट गया और माफ़ी मांगने लगा। मगर माता-पिता और भाई को सबसे ज्यादा ख़ुशी तब हुई जब राघव ने खुद की वचन दिया कि अब वह इसी छोटे शहर में रह कर अपनी पढ़ाई पूरी करेगा और फिर नौकरी करेगा।

सबने महसूस किया कि अब राघव बदल चुका है। अपनी पढ़ाई पूरी कर राघव ने नौकरी करना शुरू कर दिया। अब वह लोगों से मिलजुल कर रहता और बड़े-बुजुर्गों का आदर सम्मान करता। 

सपने देखना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन उन सपनों को साकार करने के लिए मेहनत और लगन की आवश्यकता होती है।
सबको महानगरों की चमक-दमक सुहावनी दिखती है लेकिन उनके पीछे छिपी संघर्ष की कहानी नहीं दिखती। तभी कहते हैं, दूर के ढोल सुहावने।  

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