छठ पूजा-Chath Puja

  
छठ पूजा एक महत्वपूर्ण हिंदू त्यौहार है। यह पूजा सूर्य भगवान और उनकी पत्नी उषा को समर्पित है। यह त्यौहार ऊर्जा के देवता सूर्य देवता, डला  छठ और छत मैया के सम्मान में मनाया जाता है। सूर्य देवता को उनकी सुरक्षा के लिए धन्यवाद देने और उनसे अच्छे स्वास्थ्य और खुशी का आशीर्वाद पाने  के लिए मनाया जाता है।
हिंदू धर्म के अनुसार, सूर्य को कई गंभीर रोगों से मुक्ति देने वाला और दीर्घायु प्रदान कर, समृद्धि, प्रगति और कल्याण सुनिश्चित करने वाला देवता माना जाता है। 
लोग चार दिन तक एक कठोर दिनचर्या का पालन करके त्यौहार मनाते है। अनुष्ठानों में शामिल हैं: निर्जला उपवास, पवित्र स्नान, उगते हुए सूरज की पूजा और पानी में खड़े होकर ध्यानमग्न होना। 
बिहार के अलावा, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, नेपाल, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, बैंगलोर, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़ जैसे कई अन्य राज्य भी इस महान त्यौहार को उत्साह के साथ मनाते हैं। 
छठ पूजा का इतिहास
ऐसा माना जाता है कि छठ पूजा का उत्सव प्राचीन वेदों में लिखी सूर्य पूजा के सम्मान है। 
प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, 14 वर्ष बाद अयोध्या लौटे श्री राम और उनकी पत्नी माता सीता ने शुक्ला पक्ष में कार्तिका के महीने में उपवास रख सूर्य देवता की पूजा की थी, एक बार जब वे निर्वासन के । तब से, छठ पूजा एक महत्वपूर्ण और पारंपरिक हिंदू त्यौहार बन गई, जिसे हर साल उत्साह और उत्तेजना के साथ मनाया जाता है।
छठ पूजा उत्सव
पहले दिन होती है नहाय खाय। भक्त  कोसी नदी, करनाली और गंगा में डुबकी लेकर उसतैयार नदी के पवित्र पानी को घर लेजाकर उससे प्रसाद और भोजन बनाने में उपयोग करते हैं। 
दुसरे दिन को खरना कहा जाता है। भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं, जो सूर्यास्त के बाद शाम को समाप्त होता है। सूर्य और चंद्रमा की पूजा करने के बाद, वे अपने परिवार के लिए खीर, केला और चावल तैयार करते हैं। देव पूजन और भेंट देने के बाद, वे पानी के बिना 36 घंटे तक उपवास करते हैं।
तीसरे दिन सूर्य भगवान की अंतिम किरण यानि “प्रत्यूषा” की पूजा की जाती है। सभी व्रत करने वाली महिलाएं एक टोकरी में पूजा का सारा सामाने ले कर नदी के घाट पर जाती हैं और सूर्य को दूध, जल का अर्घ्य दिया जाता है। छठी मइया की पूजा की जाती है। ये अर्घ्य सामूहिक रूप से दिया जाता है। 
चौथे दिन कि सुबह सूर्य की पहली किरण यानी ऊषा को अर्घ्य दिया जाता है। जिस घाट पर ढलते सूर्य को अर्घ्य दिया गया होता है उसी घाट पर सुबह चढ़ते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। पूजा पाठ करके कच्चा दूध और प्रसाद खाकर व्रत पूरा किया जाता है।, भक्त पवित्र जल को सुबह के लिए प्रसाद या ‘उषा अरघ्य’ अर्पित करते हैं, जिसके बाद वे अपना उपवास तोड़ देते हैं।
मुख्य त्यौहार छठ के तीसरे दिन मनाया जाता है, जब सूर्य भगवान को सूर्य नमस्कार और फल इतियादी अर्पित किए जाते है।
यह इतना कठित व्रत है, लेकिन व्रत रखने वाले में इतनी ऊर्जा आ जाती है कि उन्हें इसके बारे में पता भी नहीं चलता। माना जाता है कि सच्ची निष्ठा और साफ दिल के साथ व्रत रखा जाए तो भगवान सूर्य सभी इच्छाओं के पूर्ण होने का आशीर्वाद देते हैं। 

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