चोर पकड़ा गया

 

मुझे आज भी याद है कि उस दिन 26 जनवरी का दिन था, साल याद नहीं आ रहा। 

रात को जल्दी सो गया था क्योंकि सुबह ४ बजे उठना था। दोस्तों के साथ 26 जनवरी की परेड देखने का प्रोग्राम हम एक हफ्ते से बना रहे थे। आखिर फैसला ये हुआ कि मैं और भूषण दोनों घर से 4.30 बजे निकल कर बाकि दोस्तों को दरयागंज में मलेंगे। वहां से सब इकट्ठे होकर कनॉट प्लेस होते हुए इंडिया गेट पहुँच कर परेड देखेंगे। 
अलार्म तो नहीं लगाया था लेकिन ठीक 4 बजे नींद खुद ही खुल गयी। आंखें मलता हुआ बाथरूम की तरफ जा रहा था कि अचानक मेरी नज़र पिताजी के कमरे की अलमारी पर पड़ी। अलमारी को खुला देख अजीब सा लगा। पिताजी तो कभी भी उसे खुला नहीं छोड़ते थे क्योंकि उनके पैसे उसी में रहते थे। 
मैं बाथरूम तो चला गया लेकिन रह रह कर खुली अलमारी मेरे दिमाग में चल रही थी। खैर, बाथरूम से निबट कर आया और धीरे से पिताजी के कमरे में गया और अँधेरे में इतना ही दिखा की सामान इधर उधर बिखरा सा पड़ा था। मैंने पिताजी को नींद से जगाया और लाइट जला के देखा तो हम दोनों हैरान रह गए। 
जिस बक्से में पिताजी पैसे रखते थे वह खुला पड़ा था और खाली था। साथ में एक कैमरा भी गायब था। पिताजी ने याद कर बताया कि लगभग 50,000 रुपये और कैमरा चोरी हुआ था। हम दोनों हैरान और परेशान कि चोर कौन हो सकता है। किशन नाम का हमारा नौकर अपने कमरे में सो रहा था। उसे उठाया तो वह भी आंखें मलते हुए आया और बोला कि उसने भी किसी के आने की कोई भी आहट नहीं सुनी। 
तभी मेरी नज़र अलमारी के पास फर्श पर लगे कुछ निशानों पर गयी। फर्श पर किसी चप्पल से बने मिटटी के निशान दिखे। निशानों की बनावट देखते ही मेरे मुँह से निकला ” रूद्र प्रताप।” यह उस व्यक्ति का नाम था जो कुछ माहे महीने पहले हमारे यहाँ नौकर था लेकिन छुट्टी लेकर गाँव गया हुआ था। गाँव जाने से पहले उसी ने किशन की अपनी जगह रखवाया था। 
पिताजी ने मेरी तरफ देखा और पूछा ” क्या बोलते हो, रूद्र तो गाँव गया हुआ है।” यह सच तो था लेकिन मेरे मन में शक की सुई उसकी तरफ इशारा कर रही थी। क्योंकि फर्श पर पड़े निशान बाटा की चप्पल के निशान थे, और रूद्र हमेशा ही बाटा की चप्पल ही पहनता था। 
मैं बाहर अपने बगीचे में गया और फिर अंदर आया तो वैसे ही मिटटी के निशान फर्श पर पड़ने लगे। जनवरी में ठंड और ओस की वजह से बगीचे की मिटटी हलकी सी गीली जो हो जाती थी। यह तो तय हो गया कि जिसने भी चोरी की है वह बगीचे से ही अंदर आया था। और उसे पता था कि किस कमरे की अलमारी में पैसा रखा होता है। 
किशन से पुछा तो उसने वही कहा कि रूद्र तो गाँव गया हुआ है और वह खुद तो अंदर कमरे में सो रहा था। अब पुलिस को बुलाने के सिवाय और कोई चारा नहीं था। मैंने गाड़ी स्टार्ट की और पुलिस थाने पहुँच कर सारी बात बता दी। थाने में बहुत ही कम पोलिसवाले दिख रहे थे क्योंकि ज्यादातर तो 26 जनवरी की परेड की ड्यूटी पर लगे थे। 
थोड़ी देर बाद एक इंस्पेक्टर और एक कांस्टेबल मेरे साथ चल पड़े। रास्ते में मैंने चप्पल के निशान से लेकर रूद्र पर शक होने की बात भी बता दी। घर पहुँच कर इंस्पेक्टर ने छानबीन की, चप्पल के निशान भी देखे। उन्होंने किशन को बुला कर रूद्र का पता पुछा तो उसने यही कहा कि वह तो गाँव गया हुआ है। 
लेकिन इंस्पेक्टर साहब तसल्ली नहीं ही और किशन को अपने साथ थाने ले गए। चलते हुए मुझे 2-3 घंटे बाद थाने पहुँचने को कहा। उनके जाने के बाद मुझे और पिताजी को थोड़ा आश्चर्य भी हुआ कि थाने लेजाने पर न तो किशन के माथे पर शिकन थी और न ही वह रोया या गिड़गिड़ाया। बड़े ही शांत स्वभाव से पुलिस के साथ चला गया।
दोपहर का खाना खाकर मैं 1.30 बजे थाने पहुँच गया। इंस्पेक्टर के कमरे में घुसा ही था कि सामने रूद्र को बैठा देख हैरान हो गया, शायद मेरा शक सही निकला। तब इंस्पेक्टर साहब ने बताया कि यह सब किशन की चाल थी। उसने ही रूद्र को बहला-फुसला कर चोरी करने पर मजबूर किया था। 
सुबह से जब इंस्पेक्टर ने किशन से बहुत बार पुछा कि चोरी किसने की तो वह हमेशा की तरह ही अपनी बात पर अड़ा रहा कि उसको नहीं मालूम। लेकिन जब इंस्पेक्टर ने थोड़ी सख्ती दिखाई तो उसने सब कबूल कर लिया। उसके बताए पते पर रूद्र को भी गिरफ्तार कर लिया गया। सारे पैसे और कैमरा भी बरामद हो गया। 
इंस्पेक्टर साहब ने मुझे बताया कि किशन और रूद्र एक ही गाँव के थे। किशन जब गाँव से आया और रूद्र को मिला तो किशन के पास कोई नौकरी नहीं थी। रूद्र अच्छे कपड़े पहनता, अच्छा खाता और जेब में हमेशा पैसे होते थे। यह देख किशन को जलन होने लगी। वह रूद्र को हटा खुद नौकरी पाना चाहता था। उसने रूद्र से कहा कि गाँव के सरपंच की बेटी से उसका विवाह हो सकता है अगर रूद्र 40-50,000 रूपए सरपंच को दे दे। 
हालाँकि रूद्र अच्छा कमाता था लेकिन एक साथ इतने पैसे जमा करने में तो बहुत साल लग जाते। मगर सरपंच की बेटी से शादी का खयाल उसके मन से निकल नहीं रहा था। बस इसी का फैयदा उठा कर किशन ने उसे हमारे घर चोरी करने पर राजी कर लिया। हमारे सोने के बाद किशन ने बाहर का दरवाजा खोल रूद्र को अंदर आने दिया और दोनों ने मिल कर अलमारी खोली। रूद्र पैसे और कैमरा लेकर चला गया और किशन आकर फिर से अपने कमरे में सो गया। फर्श पर पड़े चप्पल के निशान सच में रूद्र के ही थे। 
खैर, उन दोनों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया। आगे तो माननीय कोर्ट ही फैसला करेगी कि उनको क्या सजा देनी है। 
जब मैं वहां से चलने लगा तो मैंने इंस्पेक्टर साहब से इजाजत लेकर रूद्र से पुछा ” तुझे मेरे पिताजी ने बच्चों की तरह पाला, कभी खाने पीने पहनने में कोई कमी नहीं आने दी। फिर तूने ऐसा क्यों किया।” बोलता क्या, बस मेरी तरफ देखता जा रहा था और आंसुओं से अपने पाप धोने की कोशिश करता रहा। 
देखा, गलत इंसान से दोस्ती कितनी महंगी पड़ती है।
याद रखो, गलत इंसान के मन में हमेशा कुविचार ही जन्म लेते हैं।
कीचड़ में पैर मारोगे तो कुछ कीचड़ अपने पर भी उछल के गिरेगा। 

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