चलो श्री गणेश करते हैं-Ganpati Bappa Morya

ॐ गणेशाय नमः 

हिंदी मान्यताओं के आधार पर यह बताया गया है कि कैसे गणेश जी को गणपति कहा गया। 

एक दिन देवी पार्वती को स्नान करना था। उस समय आसपास कोई दासी नहीं दिखी जिसको वह द्वार पर खड़े रहने को कह सकती। तब उनके मन में एक विचार आया और उन्होंने चन्दन के लेप से एक अति सुन्दर सा बालक बनाया। फिर उस बालक की आकृति को अपनी शक्तियों से जीवन प्रदान किया। माता पार्वती ने उस बालक का नाम रखा गणेश। उसको द्वार पर खड़े रहने और किसी को भी अंदर न आने देने के आदेश के बाद वह स्नान करने चली गयी। 
कुछ देर बाद वहां भगवान शिव का आगमन हुआ। शिवजी को काफी प्यास लगी थी, वो अंदर जाने लगे तो द्वाररक्षक के रूप में खड़े बालक गणेश ने उनका रास्ता रोक दिया। बालक गणेश ने कहाँ ” मेरी माता का आदेश है कि मैं किसी को भी अंदर न जाने दूँ, इसलिए आप अंदर नहीं जा सकते।” 
एक बालक को अपना रास्ता रोकते देख भगवान शिव बहुत क्रोधित हुए। अपने ही घर में प्रवेश पर रोक ने शिवजी का क्रोध और रूद्र कर दिया। उन्होंने तुरंत अपने त्रिशूल से उस बालक का सर काट दिया। 
इतने में माता पार्वती स्नान कर लौटी तो बालक गणेश का कटा सर देख जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया। देवी पार्वती को रोता देख भगवान शिव भी भौचक्के रह गए। तब माता पार्वती ने विलाप करते हुए उन्हें बताया ” यह तो हमारा ही पुत्र गणेश है जिसका सर आपने काट दिया।”  भगवान शिव जी को भी यह जान बहुत आघात पहुंचा और वह बहुत दुखी हो गए। 
” अापने इसका सर काटा है, तो आप ही इसे दुबारा जीवन प्रदान करेंगे। अगर अपने ऐसा नहीं किया तो मैं पूरी सृष्टि को अपने ताप से नष्ट कर दूँगी।” अब चौकने की बारी थी भगवान् शिव की। वह जानते थे कि सृष्टि का नाश करने की शक्तियां हैं देवी पार्वती के पास। 
उन्होंने ने माता पार्वती से कहा ” देवी, मैं अपने पुत्र को जीवित तो कर सकता हूँ पर सर किसी और जीवित प्राणी का जोड़ना होगा।” रुदन करते हुए माता पार्वती ने आज्ञा दे दी ” आप जो भी करें, मुझे तो बस अपना पुत्र जीवित चाहिए।”
तुरंत भगवान शिव जी ने अपने कर्मियों को किसी भी जीवित प्राणी का सर लाने को कहा। शिवजी की आज्ञा सुन कर्मी निकल पड़े। काफी दूर तक गए पर कोई भी प्राणी उन्हें नहीं दिखा। 
तभी उनकी नजर दूर बैठी हथनी और उसके बच्चे पर पड़ी। उस समय हथनी अपने बच्चे की तरफ पीठ कर के बैठी थी। सो कर्मियों ने शीग्रता से उस हथनी के बच्चे का सर काटा लिया। 
भगवान शिव ने उस हथनी के बच्चे का सर बालक गणेश के धर से जोड़ दिया और उसे जीवन प्रदान किया। माता पार्वती ने जब हाथी के सर लगे बालक गणेश को देखा तो भगवान शिव जो से पुछा ” यह आपने क्या कर दिया। गणेश पर हाथी सर लगा दिया।” 
तब भगवान शिवजी ने एक भविष्यवाणी की ” मन दुखी न करो देवी पार्वती, यह हमारा पुत्र गणेश, जिसे हाथी का सर प्राप्त हुआ है, हमेशा पूजनीय होगा। किसी भी नए और शुभ काम को करने के समय संसार के सब देवी देवताओं की पूजा अर्चना से पहले हमारे पुत्र गणेश की पूजा होगी।”
तभी, हम सब कोई नया कार्य करने से पहले कहते हैं ” चलो, श्री गणेश करते हैं।”

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