घमंडी का पतन

घनश्याम स्वर्णकार के हाथ में एक जादुई कला थी। उसकी कला देख ऐसा लगता था मानो, इंसान ने नहीं किसी मायावी शक्ति ने अपना कौशल दिखाया हो। जिस भी सोने के टुकड़े को हाथ में लेता उस पर ऐसी कलाकारी करता कि देखने वाला मन्त्र मुग्ध हो बस उस जेवर को ही निहारता रहता। 

दूर-दूर के राजयों में भी जब किसी के घर शादी ब्याह मुहूर्त निकलता तो सबसे पहले उनको घनश्याम स्वर्णकार की याद आती। लोगों को तो शादी फीकी सी लगती थी अगर दुल्हन ने घनश्याम के हाथ से बने गहने न पहने हों। 
इतना कौशल होने के बाद भी घनश्याम ने कभी भी अपनी कला पर घमंड नहीं किया। वो सदा सरल और सादा जीवन ही जीता था। उसकी वाणी में मिठास की कभी भी कमी नहीं आयी। इसी लिए दुसरे प्रांतों तक से लोग उससे स्वर्णकारी की कला सिखने आते थे। और घनश्याम हमेशा मन से उन्हें अपनी कला का ज्ञान देता। न जाने कितने ही युवक उससे ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना व्यवसाय चला रहे थे। 
घनश्याम के शिष्यों में हमेशा ही होड़ लगी रहती थी कि कौन सबसे कम समय में कला सीखता है और किसकी कला से घनश्याम जी सबसे ज्यादा प्रसन्न होते हैं। 
एक दिन गुलशन नाम का युवक उनके पास आया। घनश्याम जी के परिचित द्वारा भेजा गया था, सो उन्होंने ने उसे अपने पास ही बिठा लिया। कुछ देर अपने परिचित और उसके परिवार के बारे में हाल-चाल पूछने के बाद उन्होंने उस लड़के से उसके आने का कारण पुछा तो गुलशन ने जवाब दिया ” मैं तो आपसे सोने के गहने बनाने की कला सीखने आया हूँ। ”  तभी घनश्याम जी से मिलने कुछ लोग वहां आ पहुंचे। घनश्याम जी उन में व्यस्त हो गए। गुलशन बैठा देखता रहा कि कब इन सबकी बातें ख़तम हों और घनश्याम उसे अपनी कला सिखाए। 
कुछ देर बाद लोग चले गए, तो उतावलापन दिखते हुए गुलशन बोल उठा ” मैं इतनी दूर से आपके पास आया हूँ, काफी थक गया हूँ। आप मुझे अपनी कला कब सिखाएंगे। ” यह सुन घनश्याम जी मुस्करा पड़े और बोले ” बहुत जल्द। “
घनश्याम जी समझ चुके थे कि यह लड़का घमंडी है। लेकिन जिस परिचित ने इसे उनके पास भेजा था उसका सम्मान करते हुए उन्होंने उसे अभी आराम करने और कल से कला सीखने को कहा। 
अगले दिन दुसरे शिष्यों के साथ उसे बैठा दिया और कला की बारीकियों की जानकारी देने लगे। सब शिष्य उन बातों को धयान से सुन अपने दिल दिमाग में बैठा रहे थे। लेकिन गुलशन को इन बातों से कोई लगाव नहीं था। उसे तो बस कलाकारी सीखने की जल्दी थी, जिसके के बाद वह अपनी दुकान खोलना चाहता था। काफी देर के बाद घनश्याम जी ने सबको सोने का एक-एक छोटा टुकड़ा दिया और उस पर फूल की कलाकृति बनाने को कहा। 
सब शिष्य मन लगा कर सोने के टुकड़े पर फूल की आकृति बनाने में जुट गए। फूल बनाने के बाद सबने बनायीं हुई आकृति को घनश्याम जी को दिखाया। घनश्याम जी सबके आकृतियां देखते रहे और हर छात्र की प्रशंसा के साथ उसे सुझाव देते रहे। लेकिन जैसे ही गुलशन ने अपन आकृति दिखाई तो घनश्याम जी दंग रह गए। फूल की इतनी सुन्दर आकृति तो शायद वो खुद भी नहीं बना पाते। उन्होंने गुलशन द्वारा बनायीं गयी उस आकृति को सबको दिखाया और गुलशन की जी भर के प्रशंसा की। प्रशंसा सुन गुलशन तो फूला नहीं समा रहा था। 
अगले दिन उन्होंने सबको एक-एक और सोने का टुकड़ा दिया और उस पर मोर बनाने को कहा। उस दिन भी गुलशन ने ऐसा मोर बनाया कि घनश्याम जी दंग रह गए और उसके फिरसे खूब प्रशंसा की। 
दो दिन से अपनी प्रशंसा सुन गुलशन तो सातवें आसमान पर सैर करने लगा था। उसे लगा कि अगर घनश्याम जैसा स्वर्णकार उसकी कला से इतना प्रभावित है तो वह उसे कुछ और क्या सीखा पाएगा। उसे लगा की उसने सारी कला तो सीख ही ली है, सो क्यों वहां रह कर अपना समय बर्बाद करना। अगले दिन जब सब घनश्याम जी शिष्यों से घिरे बैठे तो गुलशन अपना सामान लिए उनके पास पहुंचा। उसके हाथ में सामान देख घनश्याम जी ने पुछा ” अरे, कहाँ जा रहे हो। ” तब घमंड से सीना तानते हुए गुलशन बोला ” गुरूजी, मैंने जो सीखना था सीख लिया, अब तो मैं चला अपनी दुकान खोलने। ” 
घनश्याम जी ने उसे काफी समझाया लेकिन अपने अहंकार और घमंड की वजह से अपने को सर्वश्रेष्ठ समझने वाले गुलशन पर उसका कुछ असर न हुआ और वो वहां से चला गया। 
गुलशन जब घर वापिस पहुंचा तो उसके माँ-बाप हैरान हो गए। यह कौनसा चमत्कार हुआ कि तुम सब इतनी जल्दी सीख गए। मगर गुलशन पर तो सिर्फ दुकान खोलने का भूत सवार था। उसकी जिद के सामने माँ-बाप की एक न चली और उन्होंने उसे एक दुकान किराये पर दिलवा दी। 
दुकान के बाहर लिखा था ” गुलशन स्वर्णकार ” 
दो दिन बाद पहला ग्राहक आया। एक औरत अंदर आयी और गुलशन से पुछा 
” मुझे चूड़ियां बनवानी हैं, क्या आप बनाते हो। ” गुलशन ने फ़ौरन हाँ कह दिया। 
” कितना खर्चा आएगा। ” 
पहला ग्राहक था सो गुलशन बोल उठा 
” जो दिल में आए दे देना। “
” अरे नहीं भाई, पहले हिसाब किताब कर लो। बाद में झंझट में नहीं पड़ना मुझे। “
अब गुलशन की समझ में नहीं आया कि क्या बोले। बोलता भी कैसे, न उसे सोने का भाव मालूम था, न उसे चूड़ी बनानी आती थी। 
उसे तो सिर्फ सोने के टुकड़ों पर आकृति बनानी आती थी। 
गुलशन को चुप देख वह औरत बोल पड़ी ” आप मुझे सोने का दाम और बनवायी अलग-अलग कर के बता दो। अगर ठीक लगा तो बनवा लूंगी। “
गुलशन के तो मानो बोल ही मुँह में सूख चुके थे। बोलता भी क्या, चला था स्वर्णकार बनने और हो रहा था शर्मिंदा। उसने किसी तरह उस औरत को कल आने को कह वहां से रवाना किया, दूकान के दरवाजे पर ताला  लगाया और घर की तरफ निकल पड़ा। 
माँ-बाप से माफ़ी मांगी और अपना सामान ले घनश्याम जी के घर पहुंच गया। घनश्याम जी को देखते ही उनके चरणों से लिपट गया। ” गुरु जी, दो दिन तो क्या, दो जीवन में भी कोई आपकी कला नहीं सीख सकता। मुझ मूर्ख को क्षमा कर अपने शरण में ले लें। और तब तक आग में तपाते रहें जब तक मैं आपके मन मुताबिक सोना न बन जाऊं। ” घनश्याम जी ने उसे उठा गले लगा लिया और माफ़ कर फिर से शिष्य बना लिया। 
अपने को सबसे उच्चतर समझना या घमंड करना, हमेशा पतन का कारण बनता है। 

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