गुस्से को कैसे काबू करें-Personality Development

अक्सर देखा है कि लोग गुस्से में बहुत कुछ ऐसे कटु शब्द बोल जाते हैं जिस पर खुद उन्हें बाद में शर्मिंदा होना पड़ता है। ना चाहते हुए भी अपने गुस्से को काबू नहीं कर पाना कोई बीमारी नहीं लेकिन आपकी मानसिकता पर प्रश्न चिन्ह जरूर लगा देती है। 
हर स्तिथि और बातचीत (discussion) को अपने नज़रिए से देखना और दुसरे के दृष्टिकोण (point of view) पर धयान ना देना, ये सब आपको एक टकराव की स्तिथि (confrontational situation) में डाल देते हैं। और फिर शुरू होता हैं आपके गुस्से का दौर, जिसे काबू करने के लिए बहुत ही सहनशक्ति की ज़रुरत पड़ती है। 
अब आप इस किस्से को धयान से पढ़े 
एक साधु बहुत ही शाँत स्वभाव के थे। हर किसी से बहुत नरमी से बात करते थे, हालांकि, कई बार सामने वाला कोई गलत बात या कोई अभद्र भाषा का प्रयोग भी कर देता, मगर उन्होंने कभी नरमी और शिष्टाचार को नहीं छोड़ा। 
उनका एक शिष्य था जो उनसे बिलकुल उल्टा था। जरा जरा सी बात पर गुस्सा आना, कोई कुछ कहें लेकिन करना अपने मन की। कभी कभी तो लड़ने तक की नौबत आ जाती थी। वो खुद अपने गुस्से से परेशान था मगर उसको काबू करने का हल नहीं मिल रहा था। सो एक दिन वो साधु के पास गया और उन से उनके शाँत स्वभाव का रहस्य बताने को कहा। 
साधू ने जवाब दिया ” ऐसा कोई गुरु मंत्र नहीं है कि अपने आप ही गुस्सा शांत हो जाए।” ” हाँ, मगर एक बात का ध्यान रखना कि आज से सात दिन बाद तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।” शिष्य ये सुनते ही काँप उठा और मायूस सा हो साधु की कुटिया से बाहर निकल आया। 
मायूस और उदास मुद्रा में देख कुछ लोगो ने उससे कारण पुछा तो उसने बड़ी ही शिष्टता से ” कुछ नहीं ” कहा और आगे बढ़ गया। आगे बढ़ा तो कुछ लोगों को आपस में लड़ते देख उनके बीच जा बड़ी ही नरमी से उनका झगड़ा सुलझा दिया। सामने से आते दो अन्य साधुओं को देख उनके चरण स्पर्श कर उनका आदर सत्कार किया। अपनी कुटिया में पहुँच अपने संगी शिष्यों के साथ घुल मिल कर बातें की। खाना तैयार नहीं था सो खुद जा मदत की। किसी के कुछ कहने पर ध्यान से सुना और शांत स्वभाव से अपनी बात कही। कोई अगर कुछ गलत बोल भी देता सो वो सिर्फ मुस्करा कर उसका उत्तर देता। ये सब पूरे सात दिन चलता रहा। 
सातवें दिन, जिस दिन को साधु ने उसका मृत्यु दिन कहा था, वो उठा और सब से गले मिला और अपनी पुरानी गुस्से में की गयी गलतियों की माफ़ी मांगी। और फिर चल पड़ा साधू से आशीर्वाद लेने। 
जैसे ही उसने उनके चरण स्पर्श किए वो बूल उठे ” कहो कैसे रहे पिछले सात दिन।” 
शिष्य ने जवाब दिया ” बहुत ही अच्छे, कभी किसी से झगड़ा नहीं हुआ, किसी को कोई अपशब्द नहीं कहा।”
तब साधु ने पुछा, मगर ऐसा क्यों और कैसे हुआ। 
तब शांत स्वर में शिष्य बोला ” बाबा, सिर्फ सात तो दिन बचे थे जीवन में सो क्यों अपने आखिरी दिनों में किसी का दिल दुखाता।”
तब उन साधु ने उसे अपने शांत रहने का रहस्य ” अब आया तुम्हारी मानसिकता में बदलाव। सात दिन तो क्या इंसान को तो अपने जीवन का एक दिन का भरोसा नहीं होता। जाने कब मौत का बुलावा आ जाए। ये जीवन बहुत ही छोटा सा है, उसे व्यर्थ की बातों में न गवाओ। अपने मन पर नियंत्रण रखो ताकि कोई मुँह से निकली बात किसी को दुःख ना पहुँचाए।” 
फिर उन साधु जी ने कहा ” जीवन बहुत ही अनिश्चित है, मैं तो क्या कोई भी उसका अंत समय नहीं जनता। हर पल को अपना आखिरी पल समझ कर व्यवहार करो और अपने शिष्टाचार की छाप  छोड़ जाओ।”
नीचे मैं कुछ जगत प्रसिद्ध टिप्स दे रहा हूँ जिसे अपने रोज़ के जीवन में अपनाने से गुस्सा काफी हद तक सीमा से बाहर नहीं जाएगा। इनका प्रयास करते रहें फिर देखें कितना फर्क पड़ता है। 
  • गुस्सा आने पर लम्बी सी सांस लो, कुछ पल उसे रोक कर रखो और फिर धीरे धीरे छोड़ दो। लम्बी लम्बी सांसें लेने से आपका मन शाँत हो जाएगा। 
  • गुस्सा आने लगे तो 1 से 10 कि गिनती मन में बोलो, फिर 10 से 1 की उलटी गिनती बोलो। ये भी आपके गुस्से को शांत करेगा। 
  • जिस वजह से गुस्सा बढ़ रहा हो उसे छोड़ कुछ और सोचना शुरू कर दो। 
  • दूसरा कुछ अपशब्द कहे तो मुस्कुरा कर जवाब दो। सामने वाला खुद ही शांत हो जायेगा। 
  • कभी ऐसी स्तिथि या जगह फँस जाए जहाँ आपको गुस्सा आए तो जल्दी से उस स्थान को छोड़ दो। 
  • और कुछ नहीं तो पानी के दो घूँट पीने से भी आपका गुस्सा और मन शांत हो सकते हैं। 

 

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