गहनों का खेल

अपनी मेहनत, ईमानदारी और लगन से  लाला रौनक मल ने खूब ख्याति और धन-दौलत एकत्रित कर ली। सुख संपन्न परिवार में दो बेटे, दो बहुऐं और पांच पोते-पोती रहते थे। बेटे और बहुऐं लाला जी और उनकी पत्नी सुनंदा की बहुत सेवा करते और ध्यान रखते थे। 

एक दिन अचानक लाला जी का स्वर्गवास हो गया। सब पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। सुनंदा का तो रो-रो कर बुरा हाल था। आखिर लाला जी का क्रियाकर्म कर सब ने अपने मन को ढाढ़स बंधाया और जीवन की आगे बढ़ाने लगे। 
लाला जी की मृत्यु के बाद सब धन-दौलत की मालकिन अब सुनंदा जी हो गयी थी। दोनों बेटे और बहुऐं उनकी बढ़-चढ़ कर सेवा करने लगे थे। उस सेवा के पीछे स्वार्थ को उनकी माता, सुनंदा, पहचान न पायी। उन्हें तो बस यही लगता था कि पिता की मृत्यु के बाद सिर्फ माँ बची है, शायद इसीलिए इतनी सेवा कर रहे हैं। मगर बढ़-चढ़ कर सेवा कर ज्यादा से ज्यादा पैतृक सम्पति हथियाने की मंशा ही थी दोनों बेटों की। 

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और एक दिन बेटों की बातों ने अपनी माता को फुसला ही लिया। सुनंदा ने अपनी सारी  की सारी सम्पति और धन-दौलत दोनों बेटों में बराबर-बराबर बाँट दी। बस फिर क्या था, सब कुछ तो मिल ही चुका था। अब देने को सुनंदा के पास बचा ही क्या था। यह जान दोनों बेटों और बहुओं ने मुँह फेर लिया। सेवा करना तो दूर उनको खाने-पीने के भी लाले पड़ गए। कोई उन्हें दो घूँट पानी तक नहीं देता। अपनी गलती का एहसास कर वह रो पड़ी। मगर अब हो भी क्या सकता था। 

कुछ महीने ऐसे ही काट गए। एक दिन उनकी छोटी बहन उनसे मिलने आयी। उनकी हालत देख वह भी अपने आंसू न रोक पायी। कहाँ तो सब पर राज करने वाले लाला जी की पत्नी थी मगर अब तो उनकी हालत एक भिखारी जैसे हो गयी थी। बहन की हर संभव मदत करने का वादा कर वह वहां से चली गयी। 
कुछ दिन बाद आयी तो उनके हाथ में एक बैग था। वह बैग उन्होंने इस तरह से पकड़ रखा था कि घर के हर सदस्य की नज़र उस पर पड़े। और उन्होंने सबके सामने वह बैग लेजा कर अपनी बहन सुनंदा को थमा दियाऔर बोली
‘ दीदी, जो गहनों की पोटली आप ने मेरे पास रखवाई थी, यह वही है। अब आप इसे अपने पास ही रखो।’
इतना कह बहन के कानों में कुछ कह वह चली गयी। 
माता सुनंदा ने बैग उठाया और अपने कमरे में चली गयी। दोनों बेटों और बहुओं ने एक दुसरे को आँखों-आँखों में पुछा ‘ यह बैग कहाँ से आया। यह तो कीमती गहनों से भरा है।’
फिर क्या था, अब उस बैग को हथयानें के चक्कर में सब ने दुबारा से माता की सेवा करनी शुरू कर दी। दिन रात सुनंदा जी के लिए अच्छे अच्छे पकवान और फल इत्यादि आने लगे। दिन में दस बार सब पूछते ‘ माँ, कुछ और चाहिए। ‘ लेकिन इस बार तो माँ ने पक्का मन बना लिया था कि इन गहनों में से किसी को भी कुछ नहीं दूँगी। 
महीनों, साल गुजर गए और सब उस गहनों भरे बैग पर नजर जमा कर सुनंदा जी की सेवा करते रहे। आखिर एक दिन ऐसा भी आया कि माँ सुनंदा को लगा कि शायद अब उनका इस संसार से कूच करने का समय आ गया है। तब उन्होंने दोनों बेटों और बहुओं को पास बुलाया और उस बैग में से सारे गहने निकल बराबर-बराबर बाँट दिए। और उसी दिन उनकी मृत्यु हो गयी। 
दोनों बेटों और बहुओं ने चैन की सांस ली कि चलो बुढ़िया से छुटकारा मिला और साथ में इतने गहने भी मिल गए। 
क्योंकि, वह गहने कुछ पुराने तरह के थे, सो दोनों बेटों ने सोचा की इन्हे बेच देते है और जो रकम मिलेगी उनसे नए गहने बनवा लेंगे। लेकिन जब सुनार के पास गहने ले पहुंचे तो पता चला यह सब तो नकली थे। सब गहने पीतल के थे और उन पर सिर्फ सोने का पानी चढ़ाया हुआ था। दोनों बेटों और बहुओं के चहरे पर तो हवाइयां उड़ने लगी। यह क्या हो गया। क्या हमने इन पीतल के गहनों के लिए ही माँ की इतने साल बेकार में सेवा की। बस फिर क्या था, सब के सब अपना माथा पकड़ बैठ गए। 
असल में हुआ कुछ ऐसे था कि सुनंदा की बहन ने जब उनकी इतनी बुरी हालत देखी तो उन्होंने ही पीतल के गहने बनवा कर सुनंदा जी को दिए थे। और गहनों के लालच में सारा परिवार उनकी आखिर सांस तक उनकी सेवा करता रहा। 
माता-पिता की सेवा करना हमारा फर्ज है। उनकी सेवा हमें किसी लालच या लोभ में पड़ कर नहीं, बल्कि सच्चे मन और प्यार से करनी चाहिए। 

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