गर्मी की छुट्टियाँ – Summer Vacations

ये तो कमाल हो गया। खाने की टेबल पर बैठे ही थे कि पापा का धमाल हो गया। ना जाने आज ऑफिस में उन्हें तरक्की मिली थी या बोनस मगर हम दोनों भाई बहनो की तो निकल पड़ी थी। 
हर साल हम अपनी गर्मी की छुट्टियां नानी के घर बिताते थे। दिल्ली की गर्मी को छोड़ पंजाब के जालंधर शहर की गर्मी का विश्लेषण करने जाते थे। नाना नानी हमें बहुत प्यार करते, कभी पिक्चर तो कभी माल ले जाते। एक से बढ़कर एक पकवान खिलाते, हमारी हर सुख सुविधा का ख़याल रखते। मगर जून की गर्मी पर उनका भी बस ना चलता और हम अपने को “आसमान से गिरा खजूर पे अटका” जैसा महसूस करते। 
मगर इस साल तो पापा ने गर्मी की छुट्टियां में हमें शिमला लेजाने का वादा कर दिया। दिल्ली की गर्मी में भी शिमला का नाम सुनते ही मानो ठंडी हवाएं चलने लगी थी। हम दोनों भाई बहन इतने खुश हुए कि लपक कर पापा से लिपट गए। 
प्रोग्राम ये था कि हम सब अपनी कार से शिमला जाएयेंगे। लेकिन हमारे जिद करने पर उसमे थोड़ा फेरबदल किया गया। तय हुआ की कालका तक ड्राइवर हमें कार तक छोड़ वापिस आ जाएगा और कालका से हम सब छोटी रेल (Toy Train) से शिमला पहुंचेंगे। फिर वापसी में हम शिमला से कालका तक दोबारा छोटी रेल में आएंगे जहाँ ड्राइवर कार लिए खड़ा होगा। 
निश्चित दिन को हम सुबह 3 बजे कार में सवार हो कालका के लिए रवाना हो गए। 
सुबह तो मौसम इतना गर्म नहीं था मगर जैसे ही सूर्य देवता के दर्शन हुए तापमान भी बढ़ने लगा। पानीपत, करनाल, कुरुक्षेत्र और अम्बाला  को पार कर हम सुबह 8 बजे कालका पहुँच गए। नाश्ते में आलू गोभी के परांठे और ठंडी लस्सी का मजा ले हमने ड्राइवर को विदा किया और स्टेशन से रेल पकड़ने चल दिए। 
भारत में कुछ ही अनुभव हैं जो कालका-शिमला मार्ग पर सुंदर इस ट्रेन की सवारी का मुक़ाबला कर सकते हैं। यह ट्रेन आपको अति मनमोहक, सुंदर और हरे भरे पहाड़ों के बीच में से लेजाती है। 1903 में शुरू की गयी ये छोटी रेल मार्ग (Toy Train Route) यूनेस्को साइट के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। हमारे साथ कई विदेशी सैलानी भी इस अति उत्तम और मंत्रमुग्ध कर देने वाले दृश्यों का आनंद ले रहे थे। धीमी रफ़्तार से चलने वाली ये ट्रेन अनगनित पुलों और 103 सुरंगों (Tunnels) से गुजरते हुए हमें एक दूसरी ही दुनिया में ले जाती है। खिड़की के पास बैठ नज़ारों के साथ ठंडी ठंडी हवा का मजा लेते हुए दिल करता है कि काश ये सफर कभी ख़तम ना हो। 5 घंटे के लुभावने सफर के बाद हम शिमला पहुंच जाते हैं। 
पापा की कंपनी का गेस्ट हाउस शिमला के मॉल रोड पर स्थित है। हम सब वहां पहुंचे तो मॉल रोड का नज़ारा देख दंग रह गए। मॉल रोड शिमला में सबसे लोकप्रिय पर्यटक आकर्षणों में से एक है जहाँ कई होटल, रेस्तरां, क्लब, बार, बैंक, दुकानें, कार्यालय, डाकघर और पर्यटक कार्यालयों हैं। लोग मॉल रोड बेफिक्र हो इधर उधर घूम रहे थे। मॉल रोड से किसी समय भी प्रकृति के सुंदर दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। दोस्तों के साथ मिलने और बात करने, हिमालयी सीमा के दृश्यों को देखने और कुछ खरीदारी करने के लिए मॉल रोड पर रिज और स्कैंडल बिंदु पर बहुत से लोग इकट्ठे होते हैं। मॉल रोड रिज बिंदु पर रिज से जुड़ा हुआ है, जहां राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय की मूर्ति बनाई गई है। शिमला एक बार ब्रिटिश भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी भी हुआ करती थी। 
दिल्ली से लम्बे सफर के बाद थकावट ने हमें उस रात जल्दी खाना खा सोने पर मजबूर कर दिया। दिल तो सोने को नहीं था पर लगता था जैसे शरीर आराम मांगता था। 
अगले दिन सुबह उठ कर सबसे पहले मैं गेस्ट हाउस के बाग में गया। ठंडी हवा का झोंका आया और मेरी अंतरात्मा तक को ठंडक पहुंचा गया। आंखें बंद कर लम्बी सी सांस ले मैं कुछ देर यु ही खड़ा रहा। अभी आंखें खोली ही थी कि सामने विशालकाय हिमालय पर्वतमाला को देख मंत्रमुग्ध और रोमांचित हो गया। 
जल्दी से तैयार हो हम सब मॉल रोड पहुँच गए। चारों तरफ हंसी ख़ुशी का माहौल था। साफ़ सुथरी सड़कें, रंग बिरंगे कपड़ों में लिपटे लोग, सैलानिओं से भरे बाजार और रेस्टोरेंट, बच्चों की किलकारियां इतियादी मिला कर ऐसा लग रहा था जैसे हम धरती के सब से खुशाल और मनमोहक कोने में आ पहुंचे हों। 
अगले दिन हम कुफरी गए जो सिर्फ 13 किलोमीटर दूर है। यहाँ के पहाड़ शिमला से भी ज्यादा ढाल पर हैं। वहां 2-3 घंटे बिता कर हम झाकू मंदिर गए जहाँ हनुमान जी की विशाल मूर्ति स्थापित है। हनुमान जी की मूर्ति इतनी भव्य और ऊँची है कि उनके मुखमण्डल को देखते हुए गर्दन में बल पड़ जाए। 
शिमला का मौसम इतना सुहावना था कि दिन भर घूमने के बाद भी थकावट महसूस नहीं होती थी। तीसरे दिन हमने मशोबरा और चैल की सैर की। यहाँ के हरे भरे सुंदरता से भरपूर प्राकृतिक दृश्यों को देख मन प्रसन्न हो गया। 
मॉल रोड स्थित लक्कड़ बाजार से हमने कई स्थानीय हस्तशिल्प, शॉल, ऊन, उत्तम गहने इत्यादि की खरीदारी की। इन शिल्पकारों के बाजार को देख यहाँ रहने वाले स्थाई निवासिओं के हाथों की कला निपुणता का पता चलता है। 
चौथे दिन हम हिमाचल स्टेट म्यूजियम देखने गए। वहां के संग्रालय में प्राचीन सिक्के, चित्र और हस्तकला की बहुत सी कलाकृतियाँ दिखाई पड़ी जो कला के पहाड़ी रूप से प्रभावित थी। दोपहर बाद हमने तारा देवी मंदिर के दर्शन किए और फिर अपने गेस्ट हाउस लौट आए। 
शिमला में ना जाने हमने कितनी ही शताब्दी पुराने स्मारक देखे। वहां के घरों का निर्माण कुछ इस तरह से किया जाता है ताकि बारिश का पानी और बर्फ ज्यादा देर तक छत पर टिक ना पाए। जिन दिनों हम वहां थे उन दिनों तो कोई भी बारिश या बर्फ नहीं पड़ी लेकिन स्थानीय लोग बताते है के क्रिसमस के आसपास बर्फ़बारी अक्सर होती है। 
शिमला आए 5 दिन कैसे बीत गए हमें तो पता ही ना चला। यहाँ की सुनदर वादियों, सुहाने मौसम ने हमें इतना मोह लिया था कि वापिस जाने का दिल ही नहीं कर रहा था। 
मगर गर्मी हो या सर्दी हमें तो अपना स्कूल का होम वर्क भी तो करना था। बहुत से विषयों से जुड़े सवालों का जवाब भी तो ढूंढ़ना था। 
इन छुट्टियों में शिमला की ये सैर मुझे काफी लम्बे समय तक याद रहेगी। अब देखते हैं कि स्कूल के और सहपाठियों ने अपनी छुट्टियां कहाँ कहाँ मनाई। 

Also Read:


Your comments encourage us

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.