गणपति बाप्पा मोरया -Ganpati Bappa Morya

क्या आप गणेश जी  के बारे में जानते हैं? हिंदू धर्म में सबसे प्रसिद्ध और सबसे पूजनीय देवताओं में से एक है।
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, कैलाश के बर्फ से ढके हुए पहाड़ों में, भगवान शिव और देवी पार्वती अपने दो बच्चों, गणेश और उनके भाई कार्तिक के साथ रहते हैं। 
यह उन दिनों की कहानी है जब गणेश और कार्तिक दोनों बहुत छोटे थे।
गणेश बड़े पुत्र होने के नाते, धैर्य और ज्ञान से भरा था। दूसरी तरफ कार्तिक, चंचल था। लेकिन वे दोनों बुद्धिमान और शक्तिशाली थे। जबकि गणेश बड़े पेट और हाथी के सिर के साथ एक बड़े शरीर वाले थे, वहीँ कार्तिक मजबूत अंगों वाला एक सुंदर लड़का था। दोनों के स्वभाव में सबके प्रति सदभाव, श्रद्धा और प्यार भरा पड़ा था। 
भगवान शिव और देवी पार्वती अपने दोनो बच्चों से बहुत प्यार करते थे, वे दोनों भी अपने माता-पिता को सर्वस्व मानते थे और पूरी तरह से उन्हें समर्पित थे। गणेश और कार्तिक की अपने माता-पिता को समर्पित अचालन को देख देवगण भी उन से बहुत खुश रहते थे। 
एक दिन, देवों की सभा में एक देव ने एक प्रश्न पुछा ” दोनों भाईओं, गणेश और कार्तिक में अधिक बुद्धिमान कौन है। ” यह प्रश्न सुन सब सोच में पड़ गए और अपनी-अपनी राय देने लगे। लेकिन सत्य की इस खोज में सब उलझ कर रह गए। तब सब देवताओं ने मिल कर फैसला लिया कि इस प्रश्न का उत्तर तो सिर्फ विश्व के रचियता भगवान् ब्रह्मा के पास ही मिलेगा। फिर क्या था, सारे देव भगवान ब्रह्मा के पास पहुँच गए। 
इतने सारे देवों को एक साथ अपने सामने देख भगवान ब्रह्मा खुश तो हुए लेकिन भांप गए कि समस्या गंभीर है। उन सब का स्वागत कर आने का कारण पुछा तो प्रश्न सुन खुद भी थोड़ा विचलित हो गए। सबको अपनी तरफ उत्सुकता से देख भगवान ब्रह्मा ने कहा ” मैं मानव जाती का रचियता हूँ, दिव्य प्राणियों का नहीं। दिव्य देव शिव और दिव्य देवी पार्वती की दोनों संतान गणेश और कार्तिक तो स्वम ही दिव्य हैं। उनमें से कौन ज्यादा बुद्धिमान है, यह आंकना बहुत ही कठिन है। ” 
सब देव इस उत्तर को सुन निराश हो गए। उनकी निराशा को देख भगवान ब्रह्मा बोले ” अगर आप सब चाहो तो मैं अपने पुत्र नारद को इस प्रश्न का हल ढूंढ़ने में लगा देता हूँ। वह अवश्य ही इसका उत्तर ढूंढ निकलेगा। “
भगवान ब्रह्मा के पुत्र नारद एक चंचल स्वभाव के शरारती ऋषि थे जो विवाद पैदा करने में प्रसिद्ध थे। जहाँ भी उनके चरण कमल पड़ते, सब समझ जाते कि कोई परेशानी आने वाली है। मगर उनमें एक महत्वपूर्ण विशिष्टता थी कि जहाँ भी कोई विवाद पैदा करते, तुरंत उसका उपाय बता सबका मन मोह लेते। एक हलकी सी मुस्कराहट और “नारायण-नारायण” हमेशा उनके मुँह पर होता। 
पिता की आज्ञा सुन, ऋषि नारद अपनी दिव्य शक्तियों का उपयोग कर कैलाश परबत पहुँच गए। 
ऋषि नारद जब भगवान शिव और माता पार्वती की प्रशंसा में वंदना गाते हुए उनके सामने पहुंचे तो भगवान शिव समझ गए कि कुछ शरारती विवाद खड़ा होने वाला है। फिर भी. ऋषि नारद का स्वागत कर पुछा 
” कहें ऋषिवर, अपने दिमाग की किस शरारत को दिखाने आपका आगमन हुआ। “
थोड़ा रुष्ट सा चेहरा बना ऋषि नारद ने जवाब दिया ” कोई शरारत नहीं प्रभु, मैं तो सिर्फ आपको एक उपहार देने आया हूँ। ” इतना कह नारद ने मुस्कुराते हुए एक सुनहरा आम उनके सामने प्रस्तुत कर दिया। 
भगवान शिव ने आम देखा बोले ” क्या तुम इतनी लम्बी यात्रा कर सिर्फ यह फल देने आये हो। “
” प्रभु, यह कोई साधारण फल नहीं है। यह एक दिव्य ज्ञान का फल है जिसका स्वाद तो अमृत से भी ज्यादा मीठा है। इस फल को खाने वाले को असीम ज्ञान प्राप्त होगा। “
यह सुन भगवान शिव ने वह आम देवी पार्वती की तरफ बढ़ाया और उसे दो भागों में बाटने को कहा। उनकी बात सुन तुरंत ऋषि नारद ने उन्हें फल को दो भागों में बांटने से रोका तो प्रभु शिव क्रोधित हो गए ” अरे, तुमने मुझे उपहार में ये फल दिया तो मैं इसे अपनी पत्नी के साथ मिल-बाँट कर खाना चाहता हूँ तो तुम्हे इसमें आपत्ति क्यों है। ”  
” प्रभु, ये फल कोई आम फल नहीं है, यह एक दिव्य फल है जिसे ऋषियों और देवों ने अपने आशीर्वाद से धन्य किया है। इसके टुकड़े हुए तो, इसकी दिव्यता नष्ट हो जाएगी। इसे एक व्यक्ति द्वारा पुरे फल के रूप में ही खाना उचित रहेगा। “
प्रभु शिव और देवी पार्वती यह सुन उलझन में पड़ गए। आजतक तो सब सांझा कर खाते थे, अब कौन अकेला खाये। तभी माता पार्वती ने सुझाया ” क्यों न हम इस फल को अपने दोनों पुत्रों में से एक को दे दें। ” 
माता पार्वती की बात सुन ऋषि नारद बोले ” पर माता, आपके तो दो पुत्र हैं, गणेश और कार्तिक, तो आप किसको यह फल देना चाहेंगी। ” 
फल किसे दिया जाए, इस पर चर्चा चल ही रही थी कि दोनों बालक, गणेश और कार्तिक वहां पहुँच गए। पिता के हाथ में आम देख दोनों के मुँह में पानी आ गया। लगभग, दोनों एक साथ ही चिल्ला उठे ” यह आम मुझे चाहिए, यह आम मुझे चाहिए। “
तब ऋषि नारद ने उन्हें बताया कि यह आम मात्र एक फल नहीं बल्कि एक दिव्य ज्ञान का फल है। इतना सुनना था कि फिर दोनों, गणेश और कार्तिक, ने झगड़ना शुरू कर दिया। दोनों को ज्ञानवर्धक दिव्य आम चाहिए था। 
माता पार्वती तो परेशान हो गयी लेकिन भगवान शिव ने नारद की तरफ देखा और बोले ” आप जब यहाँ पधारे थे, मैं तभी समझ गया था कि अवश्य ही कोई विवाद खड़ा होगा। आपको तो बस आग लगा दूर से हाथ सेकने में मजा आता है। अब, आपने यह परेशानी पैदा की है सो आप ही इसका हल निकालें। आप ही तय करें कि फल दोनों में से किस को मिलना चाहिए। “
अपनी योजना को सफल होता देख मन ही मन प्रसन्न होते हुए ऋषि नारद बोले ” प्रभु, क्यों न इन दोनों में एक प्रतियोगता की जाए। जो जीतेगा वही फल पायेगा। ” भगवान शिव ने देवी पार्वती से विचार कर प्रतियोगता की बात मान ली। 
तब ऋषि नारद ने बच्चों को प्रतियोगता की जानकारी दी ” इस प्रतियोगता में तुम दोनों को विश्व के तीन चक्कर लगाने हैं। जो भी तीन चक्कर लगा वापिस पहले पहुंचेगा वही विजय होगा और इस आम को प्राप्त करेगा। “
इतना सुनना था कि कार्तिक अपने वाहन मोर पर सवार हो विश्व के चक्कर लगाने निकल पड़ा। गणेश अब सोच में पड़ गए। खुद तो थोड़े मोटे और धीमी गति से कार्य करने थे ही, साथ में उनका वाहन मूषक भी मोर से तेज नहीं भाग सकता था। इस प्रतिस्पर्धा में अपनी हार निश्चित देख उन्होंने अपनी चतुर और तीव्रबुद्धि को दौड़ना शुरू किया और एक विचार आते ही उनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी। 
गणेश जी ने कहीं भी जाने की बजाय अपने माता-पिता के आस-पास चक्कर लगाने शुरू कर दिए। भगवान शिव और देवी पार्वती के साथ-साथ ऋषि नारद भी आश्चर्य भरी दृष्टि से ये सब देखने लगे। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर विश्व यात्रा को छोड़ गणेश अपने माता-पिता के चक्कर क्यों लगा रहा है। 
अपने माता-पिता के तीन चक्कर लगा गणेश उनके सामने उपस्थित हुए और प्रणाम कर चरण वंदना की। तब उन्होंने ऋषि नारद से कहा ” मेरे लिए तो मेरे माता-पिता ही मेरा संसार हैं, सो इस प्रतिस्पर्धा को जीतने के लिए मुझे कहीं और जाने की क्या आवश्यकता है। “
गणेश जी की कही बात सुन उनके पिता ने उनकी खूब प्रशंसा की। ऋषि नारद तो चकित हो गणेश जी के मुख मंडल को निहारने लगे और बिना कार्तिक के लौटने का इंतज़ार किए गणेश जी को विजेता घोषित कर उन्हें वह दिव्य आम उपहार स्वरुप प्रदान किया। 
गणेश जी की इस विजय पर ऋषि नारद अकेले नहीं परन्तु सारा देवलोक उनकी बुद्धिमता और चतुरता की प्रशंसा करने लगा। 
श्री गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर सबको शुभ कामनाएं।

Also Read:


Your comments encourage us