क्रोध पर विजय – Educative Moral Story

 

क्रोध पर विजय

बहुत साल पहले एक राजा अपनी महारानी और एक पुत्र के साथ सुखी जीवन व्यतीत कर रहा था।अपनी प्रजा का अपने बच्चो की तरह ख्याल रखता था। और बदले में सारी प्रजा भी उसको भरपूर सम्मान और प्यार देती थी। कभी भी किसी को कोई जरुरत पड़ती तो राजा हमेशा उसकी मदद करता। किसी भी दुखी इंसान के लिए उनका दरवाजा हमेशा खुला रहता।
 
उनका पुत्र जैसे जैसे बड़ा हो रहा था वैसे ही उसका क्रोधी स्वभाव दिखने लगा था। बात बात पर लोगों को डाँट देना, दरवाजे पर आयी प्रजा को बुरा भला कहना, धक्के दे बाहर निकाल देना उसकी दिनचर्या में शामिल हो गया था। इस बात से प्रजा में रोष और दुःख बढ़ता जा रहा था। सब इस बात से हैरान थे कि इतने भले राजा के घर ये राक्षस का जन्म कैसे हुआ।
 
पुत्र के इन क्रोधी लच्छनों का पता राजा को चला तो वो बहुत ही चिंतित हो गए। भला प्रजा को दुखी कैसे देख सकते थे।
 
एक दिन उन्होंने अपने पुत्र को बुलाया और पास बिठा बहुत समझाया और अपने क्रोध पर काबू रखने की सलाह दी। उन्होंने कहा ” पुत्र, जब भी तुम्हे क्रोध आए तो अपना बाण ले जंगल की तरफ निकल जाया करो। वहाँ किसी पेड़ पर बाण मार कर अपना क्रोध शांत किया करो।”
 
पुत्र के मन को वो बात भा गयी। जब भी उसे क्रोध आता वो अपना बाण उठा जंगल की तरफ निकल पड़ता। वहाँ तब तक पेड़ों पर बाण चलाता रहता जब तक उसका क्रोध शांत ना हो जाता।
 
कुछ दिन बाद राजा ने पुत्र को क्रोधी अवस्था में जंगल की तरफ जाते देखा तो वो उसके पीछे चल दिए। हमेशा की तरह पुत्र ने बाण पेड़ों पर चलाना शुरु कर दिया। तभी आगे बढ़ राजा ने उसको रोका और हाथ पकड़ एक पेड़ के पास ले गए। पेड़ पर लगे बाणों के छिद्र दिखा बोले ” देखो पुत्र, तुम्हारे क्रोध की वजह से इन पेड़ों को कितना कष्ट उठाना पड़ा। इनके घाव कैसे भर पाओगे। तुम्हारे क्रोध के चिन्ह तो हमेशा इन पेड़ों पर दिखते रहेंगें।”
 
पुत्र निरुत्तर था।
 
” इसी तरह जो घाव तुम लोगों को देते हो वो कम तो हो सकते है लेकिन मन के घाव कभी भर नहीं पाएंगे।”
 
यह बात पुत्र की समझ में आ गयी और उसने प्रण लिया कि अब कभी किसी पर क्रोध नहीं करेगा।

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