कौन सी सेठानी-Hindi Story for Kids

अपने को गांव का सबसे अमीर आदमी समझने लगा था सेठ सुरेश चंद। जब देखो अपनी दौलत का दिखावा करना उसका शोक हो गया था। 
कोई उसे मिलने आता तो उसे बैठाने से पहले बता देता ” यह सोफे मैंने लन्दन से मंगवाया है।” चाय पिलाते हुए बोल देता ” यह कप मैंने बेल्जियम से मंगवाया है।” कालीन को देख कोई तारीफ कर दे तो तुरंत ही सुना देता ” यह कालीन मैंने दुबई से मंगवाया है।”
एक दिन उसने हरी नाम के एक लड़के को अपने यहाँ नौकरी पर रख लिया। और सारा काम उसे समझाते हुए बोला ” देखो, जब भी मैं किसी चीज को लाने को कहुँ तो तुम पहले पूछना “जनाब, कौन सी, लन्दन वाली या दुबई वाली। इससे देखने वाले पर रोब पड़ता है।” 
हरी एक सीधा सादा लड़का था जो इन अमीरी चोंचलों के बारे में कुछ नहीं जनता था। वो तो यह मानता था कि मालिक जो भी कहे उसे बस पूरा करना है। जैसा मालिक चाहे वही करना चाहिए। 
एक दिन सेठजी के कुछ पुराने दोस्त उनसे मिलने आने वाले थे। उन पर भी वह रोब डालना चाहते थे सो उन्होंने अच्छे-अच्छे पकवान बनवाये और ठंडे गरम भी मंगवा लिया। 
जैसे ही दोस्तों की टोली उनके घर पहुंची सेठ जी ने खुद अगवाई कर उन सबका दिल खोल के स्वागत किया। अंदर पहुँच उन्हें आदर सहित बिठाया गया। बढ़िया से बढ़िया नाश्ता, ठंडा, गर्म पेय और न जाने क्या-क्या उन्हें खिलाया। 
चाय नाश्ता चलता रहा और साथ में चलता रहा सेठजी का डींगें मारने का सिलसिला। कचोरी उन्होंने खासतौर से जोधपुर से मंगवाई थी, दालमोठ तो आगरा के महशूर हलवाई से आर्डर दे कर बनवायी गयी थी, खजूर की बर्फी तो अशर्फी नामक इस्तानबुल की दूकान के यहाँ की है। और न जाने कौन सी चीज कहाँ से आयी थी। 
दोस्त-यार औपचारिता वश ये सब सुनते रहे और उनकी हाँ में हाँ मिलाते रहे। सबके चेहरे से साफ़ दिखने लगा था कि वो यह सब सुन के पाक चुके हैं। आखिर कब तक सेठीजी की उलटी सीधी डींगों को सुनते रहते। 
दोस्तों में से एक ने उनसे पुछा ” तुम्हारी पत्नी दिखाई नहीं दे रही, कहीं बाहर गयीं हैं क्या। ” यह सुनते ही सेठजी ने दोस्तों पर रोब डालने के लिए हरी को पुकारा। 
मालिक की आवाज सुनते ही हरी लगभग दौड़ता हुआ वहां पहुंचा और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। उसकी इस हरकत से दोस्त बहुत प्रभावित हुए और सेठजी उस प्रभाव को देख मन ही मन मुस्कुराने लगे। 
उन्होंने हरी को फ़ौरन सेठानी को बुलाने का हुकुम दिया। कुछ पल तो हरी थोड़ा झिझका पर फिर मालिक का आदेश याद कर, ना चाहते हुए भी बोल ही पड़ा 
” कौन सी सेठानी, लन्दन वाली यां दुबई वाली । ” 
यह सुनते ही दोस्त तो हंस हंस के लोटपोट हो गए, मगर शर्म से सेठजी ने अपना चेहरा नीचे झुका लिया। 
अपनी बढ़ाई खुद करना हमें शोभा नहीं देता,
बल्कि कभी न कभी उपहास का पात्र अवश्य बना देता है। 

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