कंजूस मक्खीचूस -Miser Farmer

गांव का एक किसान बहुत धनी था। खेत खलिहान से कमाई बहुत अच्छी करता था। मगर जब कहीं पैसे खर्च करने की बात होती तो अपनी गरीबी का रोना रो देता। यहाँ तक कि उसके घर वाले भी उससे परेशान थे। अच्छा खाना, अच्छा पहनना, कहीं दूसरे शहर घूमने या किसी मेले में जाना उसे फिजूलखर्ची लगती थी। 

जितना भी कमाता उसे अपने संदूक में बंद कर के रख देता। उसे बस एक ही शौक था, हर रात सोने से पहले जमा किए धन को गिनना और फिर से उन्हें संदूक में बंद करना। 
महीनों, सालों बीत गए मगर उसकी कंजूसी में कोई फर्क नहीं आया। और न ही फर्क आया उसकी रोज़ रूपए गिनने की आदत में। 
एक रात बहुत ज़ोरदार बारिश के बाद बिजली बंद हो गयी। सारा गांव अन्धकार में डूब गया। काफी देर तक लोग गर्मी से परेशान हो अपने घरों के बाहर बैठे रहे। मगर आखिर कब तक अपनी नींद को रोक पाते। सो धीरे-धीरे सब सोने चले गए। 
इस धनी किसान का भी नींद से बुरा हाल था मगर वो इंतज़ार कर रहा था बिजली के वापिस आने का। आखिर उसे सोने से पहले अपनी जमा धनराशि को गिनना जो था। जब काफी रात बीत गयी और बिजली आने के कोई आसार नहीं लग रहे थे तो वो भारी मन से उठा और अपने कमरे में जा पहुंचा। 
पलंग पर लेट तो गया मगर धयान उसका रुपयों की तरफ ही लगा रहा। इधर उधर करवटें बदलता रहा मगर नींद तो तो उससे कोसों दूर थी। आखिर जब बेचैनी बहुत बढ़ गयी तो वो उठा और संदूक को अपनी तरफ खींचा और उस पर हाथ फेरने लगा। जैसे कोई किसी अपने दुलारे को सेहला रहा हो। 
फिर भी मन की बेचैनी दूर न हुई तो उसने अँधेरे में ही उस संदूक का ताला खोला और रुपयों के बंडलों पर हाथ रख बैठ गया। मानो रुपयों के दिल की धरकन सुन रहा हो। रुपयों पर हाथ रख उसे कुछ चैन महसूस हुआ। रहत तो मिली मगर उसकी बेचैनी तो उन्हें गिनने से ही दूर हो सकती थी। 
नींद से आंखें बोझल हो रही थी मगर रुपयों के बंडल उसे अपने आगोश में बुला रहे थे। तभी बहार जोर से बिजली गर्जी और उस बिजली के प्रकाश में उसकी नज़र रुपयों पर पड़ी तो उसके दिमाग में विचार आया कि क्यों न मोमबत्ती जला कर रुपयों को गिन लूँ। ये बात सोचते ही वो उठा और जाकर रसोईघर से मोमबत्ती और दियासलाई उठा लाया। 
मोमबत्ती को रोशनी जब रुपयों पर पड़ी तो उसके मन को कुछ आराम मिला। उसने रुपयों को गिनना शुरू कर दिया। आधी नींद में होने के कारण जब गिनती पूरी हुई तो रूपए उसे कम लगे। बेचैनी छोड़ अब उसे परेशानी होने लगी। सो उसने रूपए दोबारा गिनना शुरू किया और तब तक गिनता रहा जब तक उसे सही रकम का पता नहीं चल गया। 
गिनती पूरी होते-होते सवेरा होने लगा था। नींद से बुरा हाल था मगर उसके चेहरे पर एक राहत और संतुष्टि की आभा झलक रही थी। और उसी आनंदित और इच्छा अनुकूल अवस्था में वो गहरी नींद सो गया। 
निंद्रावस्था में भी वो रुपयों को गिनता रहा। रूपए गिनना उसके मन को ठंडक पहुंचा रहे थे मगर तभी सपने में उसे कुछ गर्मी सी महसूस हुई। गर्मी के साथ सांस लेने में भी तकलीफ होने लगी तो झट से उसकी नींद टूट गयी। 
आँखें मलता हुआ उठा तो सामने पड़े सक्न्दूक में लगी आग पर उसकी नज़र गयी। हे राम! ये क्या हो गया। रुपयों से भरा संदूक जल कर राख हो गया था। सारे जीवन की जमा की हुई पूंजी को राख की तरह पड़े देख उसकी अंतरात्मा तक काँप उठी, दिल की धड़कनें थमने सी लगी, आंखें तो मानो पथरा सी गयी थी। 
सन्दूक से उठते धुंए को देख गाँव वाले भी इकठ्ठा हो गए। संदूक के पास जल रही मोमबत्ती ने सारा हाल बयान कर दिया। नींद से बोझल किसान रूपए गिनने के बाद मोमबत्ती बुझाना भूल गया था। 
सबने मिल कर उस जलते संदूक को बाहर फेंका और किसान को कमरे से बाहर खुली हवा में ले गए। 
बाहर खुली हवा ने किसान को कुछ राहत सी मिली तो अपनी लुटी पूँजी को याद कर उसकी आंखों से आँसुओं का सैलाब उमर पड़ा। रोते, चिल्लाते, छाती पीटते वो अपनी पूँजी को याद करने लगा। तब गाँव के एक बुजुर्ग ने उसे समझाया कि रूपए तब तक पूँजी कहला सकते हैं जब आप उनका प्रयोग करें। बंद संदूक में तो वो मात्र कागज के टुकड़े ही हैं। 
धन, संम्पति सिर्फ संग्रह की वस्तु नहीं, समय अनुसार इसका सदुपयोग भी करना चाहिए। 

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