ईर्ष्या पर नियंत्रण करो-Self Improvement

 

ईर्षा (Envy or Jealousy) एक ऐसा घुन (Wood worm) है जो इंसान के दिमाग को सुन्न और खोकला कर देता है। अपने को किसी भी ऊंचाई पर ले जाएँ, कितने भी सपने संजो लें लेकिन अगर ईर्षा आप में घर कर गयी तो समझो सब बेकार सिद्ध होगा। किसी दुसरे की ख़ुशी में भागीदार बन उसकी ख़ुशी को चार चाँद लगाओ, उस ख़ुशी से जल-भुन कर अपना मन छोटा करने की तो कभी सोचो ही नहीं। 

मुझे अच्छी तरह याद है, जब हमारे दोस्तों के ग्रुप में कोई कुछ नया खरीद कर लाता था तो हममें से कुछ यारों की शकल से ही पता चल जाता था कि उन्हें जलन हो रही है। उस नयी वस्तु के लिए उलटे सीधे कटाक्ष सुनने को मिलते थे। अकेले में तो कुछ यहाँ तक कह देते थे ” कोई दो नंबर का काम किया होगा, वार्ना इसके पास इतने पैसे कहाँ से आए।” अब आप खुद ही सोचो वो बेचारा अपनी ख़ुशी बाटने आया था और बधाई के बदले मिली तो सिर्फ तानो की बौछार। 

दुसरे की तरक्की किन कारणों से हुई उस पर ध्यान दो, हो सकता है उसमें वो काबलियत हो, या वो अपना लक्ष्य पाने की लिए ज्यादा मन लगा कर मेहनत करता हो। जब आप दूसरों की ख़ुशी से जलना छोड़ उस लक्ष्य को पाने में अपने मन लगा देंगे तो  तरक्की को रोक सकता है। नीचे लिखी इस कहानी से आप समझ जाएँगे कि ईर्षा इंसान की सफलता में सबसे बड़ा रोड़ा होता है। 

 

सतीश एक दिन जब चमचमाती नयी कार ले कर घर पहुंचा तो उसके पड़ोसी विवेक को जलन होने लगी।

ऑफिस में भी बैठा हुआ काम कम करता, ज्यादा वक़्त कार खरीदने के सपने देखता रहता।आखिर जब अपनी ईर्ष्या के आगे उसकी एक ना चली तो उसने बॉस को ३ लाख रुपये के लोन की अर्जी थमा दी।

पहले तो लोन की अर्जी देख बॉस हैरान हुआ मगर फिर विवेक के पिछले अच्छे रिकॉर्ड को देख मंजूरी दे दी। विवेक के दिल की जलन थोड़ी शांत हुई।

अगले हफ्ते विवेक को लोन डिपार्टमेंट से ३ लाख रुपये का चेक मिल गया, बस फिर क्या था ऑफिस के बाद विवेक सीधा कार डीलर के शोरुम गया और अपनी मन पसंद कार खरीद ली।कार डीलर ने नयी कार अगले दिन डिलीवर करने का वादा किया तो विवेक को ऐसा लगा मानो वो आसमान में उड़ रहा हो। 

अगले दिन ऑफिस से छुट्टी ले, बिना अपनी पत्नी शालू को बिना बताये कार लेने चला गया।वो शालू को सरप्राइज देना चाहता था। शाम को नयी कार में उड़ता हुआ विवेक घर पहुंचा।कार लॉक करते हुए सतीश के घर की तरफ तिरछी नज़रों से देखा कि कोई उसकी नयी कार को देख रहा है कि नहीं। 

किसी की भी ऑंखें अपनी तरफ ना देख थोड़ा मायूस हुआ और घर की तरफ चल दिया और अन्दर आ कर बोला ” चलो शालू, आज कहीं घूमने चलते है।” शालू भी झट से मान गयी और १० मिनट में तैयार हो गयी ।थोड़ी हैरान तो थी मगर पति के साथ घूमना उसे बहुत पसंद था। 

दोनों ने घर लॉक किया और चल पड़े।बाहर आकर शालू बोली ” अरे! आप हेलमेट तो लाए नहीं।” मुस्कराते हुए विवेक ने जवाब में कहा ” जानू! आज के बाद हेलमेट नहीं सीट बेल्ट बाँधना सीख लो।” और फिर उसने नयी कार की तरफ इशारा किया तो शालू हक्का बक्का रह गयी।मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे, उसका चेहरा पीला से पड़ गया हो। 

किसी तरह अपने भाव काबू कर पूछा ” क्या आपने इसे खरीद लिया है या सिर्फ मुझे तंग कर रहे हैं।” हलकी सी हँसी हँसते हुए विवेक बोला ” मैंने नहीं, हमने यह कार खरीदी है, तुम्हे इसका रंग पसंद है कि नहीं।” ” नहीं नहीं, मुझे पसंद है लेकिन इतने पैसे आए कहाँ से।”

” अरे जानेमन! कहीं भी डाका नहीं डाला, ऑफिस से लोन लिया है।” खुशी से गुनगुनाते हुए उसने कार का दरवाजा शालू के लिए खोला और उसके बैठने के बाद उसकी साड़ी के पल्लू को दरवाजे केअंदर किया कि कहीं दरवाजे में ने फँस जाए।ड्राइविंग सीट की तरफ जाते हुए फिर उसकी नज़रें सतीश की ढूंढ रही थी मानो कहना चाहती हो ” देख, मैंने भी कार खरीद ली।”

शालू दिखने के लिए खुश तो लग रही थी मगर दिल में उसके बवाल मचा हुआ था। विवेक ने बिना सोचे समझे कार तो खरीद ली मगर अब उसकी EMI तो भरनी ही पड़ेगी हर महीने। सास ससुर के इलाज के खर्चे, ननद की पढाई और फिर उसकी शादी भी तो करनी थी। और अगर कल अपना बच्चा हो गया तो सर पर और खर्चों का बोझ पड़ जाएगा। आखिर सतीश ने ऐसा क्यों किया। बस इसी उधेड़ बुन में बैठी रही। घूमने का सारा मजा उड़नछू हो चूका था। 

कुछ देर इधर उधर ड्राइव करने के बाद दोनों एक रेस्टोरेंट गए और खाने का आर्डर दिया। खाना खाते हुए विवेक ने पूछा “आज कुछ उदास सी लग हो। क्या कार पसंद नहीं आयी।” “नहीं, ऐसा तो नहीं। कार तो बहुत अच्छी है लेकिन अभी तक मैं यह नहीं समझ पायी कि एक दम से तुम्हारा इरादा कैसे बन गया। और कुछ मुझसे ना पूछा ना सलाह की।” 

अब विवेक अपने को रोक नहीं पाया और वो बोल पड़ा “देखो, कार लेने के बाद समाज में हमारी शान और इज़्ज़त इस कार की वजह से बढ़ जाएगी। लोगों को जलन होगी सो अलग।” 

विवेक के मुँह से यह सब सुन शालू को कुछ शक हुआ “तुम किसे जलाने के लिए कार लाए हो।” 

“अरे, वो सतीश अपने को समझता क्या है। जब से उसने कार ली है तबसे अपने को लाट साब समझने लगा है।” 

यह सुन शालू को लगा मानो उसे चक्कर आ जाएगा। विवेक ने कार सिर्फ इस लिए खरीदी ताकि सतीश के सामने छोटा ना पड़ जाए। 

शालू की आँखों में आँसू आ गए। आखिर विवेक ने यह सब क्या कर डाला। पति को बड़े ही शांत स्वर में बोली “आपने बहुत ही गलत कदम उठाया है जिसका नुक्सान हम सब को उठाना पड़ेगा। सतीश और उसकी पत्नी अकेले रहते हैं। ना तो माँ बाप की फ़िक्र और ना किसी भाई बहन की शादी करवानी है उन्हें। पर आप कैसे भूल गए कि हमारी पहली ज़िम्मेदारी है माँ और बाऊजी और फिर बहिन की शादी भी आप ही को करानी है।” इतना बोल शालू चुप से बैठी विवेक का चेहरा देखने लगी। 

तब विवेक के दिमाग ने काम करना शुरू किया। सब खर्चों का हिसाब, अपनी तनख़्वाह का हिसाब और फिर उसके पसीने छूटने लगे। आखिर यह EMI के १५,००० रूपए हर महीने कहाँ से आएँगे। उसका दिमाग चकरा गया। इस ईर्ष्या द्वेष के चक्कर में पड़ कर बिना सोचे समझे उसने क्या कर दिया। 

दोनों से खाना मुश्किल हो गया। आखिर थोड़ा सा खा कर बिल मंगवाया और पैसे दे कर बाहर आ गए। 

सामने अपनी चमचमाती कार को देख विवेक का दिल बैठने लगा। जो कार कुछ पल पहले उसे भरपूर ख़ुशी दे रही थी अब वही मानो उसके गले की हड्डी बन गयी थी। 

 

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