ईमानदार का जमानती कौन

राजस्थान के एक छोटे से गाँव में राम सहाय अपने परिवार सहित रहता था। एक बेटा घनश्याम, 2 बेटियां और पत्नी के इलावा उनके परिवार में और कोई नहीं था। 

बाप बेटा दिन रात अपने खेत में मेहनत करके फसल उगाते और पक जाने पर उसे मंडी में लेजाकर बेच देते। बस यही थी उनके पूरे परिवार की कमाई। शहर से दूर बसे गाँव में कमाई करने का और कोई साधन भी नहीं था। 
एक साल जब फसल पकने को तैयार थी तो घनघोर बारिश हुई और सारी फसल नष्ट हो गयी। तेज बारिश के कारण अपनी फसलों को नष्ट होता देख दोनों बाप बेटे की आँखों में आंसू आ गए। कुछ कर भी तो नहीं सकते थे। महाजन से खेतीबाड़ी के लिए जो क़र्ज़ लिया था, उसे चुकाना तो दूर, इस साल तो घर में खाने के भी लाले पड़ते दिख रहे थे। 
कुछ दिन तो दाल-रोटी चलती रही मगर एक दिन ऐसा भी आया कि घर में पकाने को कुछ भी नहीं बचा। तब लाचार हो कर राम सहाय ने अपने बेटे घनश्याम से कहा ” बेटा, यहाँ तो कुछ कमाई दिख नहीं रही, और महाजन का कर्ज़ा भी सर पे खड़ा है। क्यों न तुम शहर जाकर देखो कहीं कोई काम मिल जाए।” घर की आर्थिक तंगी को देखते हुए घनश्याम भी तुरंत राजी हो गया। 
दो तीन दिन बाद घनश्याम अपना गाँव और परिवार छोड़ जयपुर की तरफ चल दिया। वहां पहुँच कर सुबह शाम नौकरी ढूंढ़ने में लग गया। लेकिन जहाँ भी जाता, हर कोई उससे किसी जमानती को साथ लाने को कहता। अब जमानती कहाँ से लाता, वह तो इस शहर में किसी को जानता तक नहीं था। 

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तीन दिन बीत गए और उसे कोई नौकरी न मिली और न ही जमानत देने वाला। जो पैसे घर से लाया था वह भी लगभग खत्म होने वाले थे। अब उसने तय किया कि सिर्फ एक वक़्त का खाना ही खाएगा ताकि पैसे कुछ और दिन चल सके, शायद तब तक कोई नौकरी हाथ लग जाए। 
पूरे 7 दिन बीत जाने पर भी जब किसी नौकरी का इंतजाम नहीं हुआ तो घनश्याम टूट सा गया। लेकिन सवाल था कि वापिस गाँव लौटने से भी क्या होगा। वहां कौन सी कमाई का साधन है, सिर्फ कर्जदार ही खड़े है। जेब में हाथ डाला तो आखिरी 50 रूपए का नोट ही बचा था। यह देख उसकी आँखों में आंसू आ गए। 
सुबह के ७ बजे थे और उसने कल से कुछ नहीं खाया था। खाता भी कैसे, पैसे तो लगभग ख़तम ही थे। तभी एक विचार आया कि क्यों न किसी मंदिर चला जाए, शायद वहां कोई भोजन बांटने आया हो। 
मंदिर पहुंचा तो वहां एक दंपत्ति को खाना बांटते देख वह भी लाइन में लग गया। खाना मिला तो वह खाने का पत्तल लेकर मंदिर की सीढ़ियों पर ही बैठ गया। तभी एक सेठ मंदिर से पूजा की थाली हाथ में लिए बाहर निकले। सीढ़ियां उतरते समय उनका पाँव फिसल गया और वह धड़ाम से गिर पड़े। लोगों ने भाग कर उन्हें उठाया और थाली उठा कर उनके हाथ में थमा दी। भगवन का शुक्र कुछ ज़्यादा चोट नहीं लगी थी। सेठ अपनी कार में बैठ चले गए। 
तभी खाना खाते हुए घनश्याम की नज़र सीढ़ियों पर पड़े एक पर्स पर पड़ी। उसने उसे उठाया तो उसमे नोट ही नोट भरे थे। वह समझ गया कि हो न हो यह पर्स उन सेठ का ही है जो अभी गिर गए थे। लेकिन सेठ जी तो जा चुके थे। घनश्याम ने पर्स को ध्यान से देखा तो अंदर एक कार्ड पड़ा था जिस पर जोहरी बाजार में स्तिथ किसी दुकान का पता लिखा था। खाना तो खा ही चुका था, सो घनश्याम जोहरी बाजार की तरफ निकल पड़ा। 
जब उस पते पर पहुंचा तो देखा कि दुकान तो बंद थी। आस-पास लोगों से पुछा तो पता चला कि यह दुकान तो लगभग 12 बजे ही खुलेगी। अब 12 बजे तक इंतजार करने के इलावा कोई चारा भी नहीं था, और उसे कौन सी नौकरी पर पहुंचना था। इधर-उधर घूमता रहा और ठीक 12 बजे दुकान पर पहुँच गया। 
दुकान खुली देख, अन्दर गया तो सामने सुबह वाले सेठ जी को देख राहत की सांस ली। उनके पास जाकर उनका पर्स उनकी मेज पर रख दिया। अपने पर्स पाकर सेठ जी बहुत खुश हुए। उन्होंने बताया कि जब उन्हें पता चला कि उनका पर्स कहीं गिर गया है तो वह दुबारा मंदिर गए थे, लेकिन पर्स उन्हें वहां नहीं मिला। तब घनश्याम ने बताया ” सेठी जी, जब आप गिरने के बाद गाड़ी में बैठ चले गए थे, तो मेरी नज़र इस पर्स पर पड़ी थी। वह तो अच्छा हुआ की इसमें आप का कार्ड मिल गया और मैं यहाँ तक पहुँच पाया। “
तब सेठ जी ने उससे पुछा ” क्या तुम्हारे मन में इतने रूपए देख कर यह ख्याल नहीं आया कि पर्स तुम ही रख लो।” तो घनश्याम ने उत्तर दिया ” सेठ जी, में एक किसान का बेटा हूँ और पिता ने सारी जिंदगी ईमानदारी ही सिखायी है। जैसे हमारी फसल भगवान भरोसे होती है, वैसे ही हमारी जिंदगी भी। धोखाधड़ी या बेमानी से पैसा कमाना तो हमने कभी सीखा ही नहीं।”
सेठ जी इस उत्तर से बहुत ही प्रसन्न हुए। उन्होंने 1000 रूपए इनाम के उसे देने चाहे, लेकिन पर्स लौटाने को अपना फ़र्ज़ बता घनश्याम ने उन्हें लेने से इंकार कर दिया। तब सेठ जी ने घनश्याम के सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया और बोले ” बेटा, कभी भी किसी चीज की आवश्यकता हो तो बिना झिझक चले आना।” 
घनश्याम उन्हें प्रणाम कर जाने ही वाला था कि सेठ जी ने उससे पुछा ” कहाँ रहते हो बेटा।” 
” सड़क पर या पुल के नीचे।” यह उत्तर सुन सेठ जी हक्के बक्के रह गए। 
” और काम क्या करते हो।” इतना सुनना था कि घनश्याम की आँखों में आंसू आ गए। रोते हुए उसने सेठ जी को बताया कि कैसे कोई जमानती न होने पर कोई उसे नौकरी नहीं देता। पिछले 7 दिनों से वह जयपुर में नौकरी तलाश रहा है। 
इतना सुनना था कि सेठ जी तुरंत बोल उठे ” तुम तो खुद में ही अपने जमानती हो। फिर भी कभी कोई पूछे, तो कह देना तुम्हारा जमानती मैं हूँ।” और फिर सेठ जो ने उसे अपनी दुकान पर अच्छी पगार पर रख लिया। रहने का इंतज़ाम भी कर दिया। 
देखा, कैसे ईमानदारी का हर कोई सम्मान करता है।
अच्छे कार्य करते हुए फल की मत सोचो, 
वह तो किसी न किसी रूप में स्वयं तुम्हे मिल जायेगा। 

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