असली दोस्त की पहचान

जैसे जैसे दोनों दोस्त आगे बढ़ते जा रहे थे उन्हें महसूस हो रहा था कि जंगल और भी ज्यादा घाना हो रहा था। मगर करते क्या, दोनों उस घने जंगल में अपना रास्ता भटक गए थे। जंगल से बाहर निकलने का मार्ग दिख ही नहीं रहा था। 
कुछ कदम और चले तो उन दोनों के चेहरे पर बेचैनी और डर साफ़ दिख रही था। मछरों और नुकीले काँटों से बचते बचाते वह चुप चाप चलते जा रहे थे। किसी जंगली जानवर के हमले या साँप से काटे जाने का डर हर वक़्त उनके मन में घबराहट बढ़ा रहा था। 
अचानक उन्हें एक छोटा सा रास्ता दिखाई दिया। रास्ता देख उनकी जान में जान आयी। सोचा अब तो बाहर निकल जाएँगे। उस रास्ते पर कुछ दूर ही गए थे कि सामने उन्हें एक टीला दिखाई दिया। उस टीले पर पहुँच उन्होंने चैन की सांस ली। अब कम से कम नुकीले काँटों से तो छुटकारा मिलेगा। थक हार कर बैठ गए और सोचने लगे कि अब जंगल से बाहर कैसे निकला जाए। कोई रास्ता ने देख उन्होंने अपने को भगवान के भरोसे हो छोड़ना बेहतर समझा। 

एक बोला ” ऐसा करते हैं कि तुम टीले की एक तरफ और मैं दूसरी तरफ रह कर भगवान से प्रार्थना करते हैं। देखें किसकी प्रार्थना स्वीकार होती है।” और दोनों टीले के अलग अलग कोने में जा पहुंचे। 
भूख प्यास से बेहाल पहले मित्र ने भगवान से कुछ खाने को माँगा। बस तभी उसकी नजर सामने लगे पेड़ पर गयी। वो पेड़ तो फलों से लदा था। अपनी प्रार्थना स्वीकार होते ही वो भाग कर गया और अपनी भूख मिटाई। खाते वक़्त उसे अपने साथी की याद भी ना आयी। पीने का पानी माँगा तो कुछ दूर पर एक झरना दिख गया जहाँ उसने निर्मल जल पिया। 
खाते पीते दो दिन बीत गए तो उसे याद आया कि क्यों ना भगवान से रात बिताने के लिए एक कुटिया मांग ली जाए। फिर क्या था, झरने से लगी एक कुटिया देख वो गदगद हो भगवान को धन्यवाद देने लगा। अपनी हर इच्छा पूरी होते देख उसके दिल में एक बार भी अपने साथी की खबर लेने का विचार नहीं आया। 
अगले दिन उसने भगवान से जंगल से बाहर निकलने में मदत करने की प्रार्थना की। बस तभी उसने देखा कि एक छोटी से बच्ची हाथी पर सवार हो वहाँ से गुजर ताहि है। हाथी पर सवार उस बच्ची को देख इस व्यक्ति की ख़ुशी का ठिकाना ना रहा। वो दौड़ कर उस बच्ची के पास गया और आप बीती सुना उसे जंगल से बाहर निकलने के लिए अनुरोध किया। बच्ची ने उसे हाथी पर बैठा लिया और कहा कि वो उसे जंगल से बाहर निकाल देगी। 
चलने ही वाले थे कि उस बच्ची ने उस व्यक्ति से पुछा ” क्या तुम अपने मित्र को साथ नहीं जाओगे।” इतना सुनते ही उसे अपने साथी की याद आयी। लेकिन वो घमंडी भगवान द्वारा दिए गए आशीर्वाद को अपनी सफलता मान गर्व से बोला, ” भगवान से प्रार्थना तो मैंने की थी सो मुझे उसका फल मिल गया। मेरे साथी ने प्रार्थना नहीं की तो उसका फल उसे कैसे मिल सकता है।”
यह सुन वो बच्ची तोडा मुस्कुराई और बोली ” असल में तुम्हारी नहीं बल्कि तुम्हारे दोस्त की प्रार्थना का फल तुम्हे मिल रहा है।” इस बात को नकारते हुए वो बोला ” ऐसे कैसे हो सकता है। उसने कौन सी ऐसी प्रार्थना की जिसका फल मुझे मिल रहा है।” तब उस बच्ची ने उसे बहुत धीरज से बताया कि तुम्हारा साथी भगवान से रोज़ सिर्फ एक ही प्रार्थना करता था। पूछने पर उस बच्ची ने उसके दोस्त के उस प्रार्थना को दोहरा दिया,
” हे प्रभु! कृपा कर मेरे दोस्त की सब प्रार्थना सुन लो और उसे अपना आशीर्वाद प्रदान करो।”
हमें मित्र तो बहुत बनाने चाहिए लेकिन असली मित्रों की पहचान संकट के वक़्त ही होती है। 

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