अभिमानी मेंढक – Moral Story for Children

गांव के किनारे बहती नदी में एक मेंढक रहता था। वह एक बहुत बड़ा मेंढक था और उसे अपने आकार का वह बहुत गर्व था। अन्य सभी मेंढक उससे डरते थे और उस डर की वजह से उसका बड़ा सम्मान करते थे।

मेंढक ने उस नदी को अपना साम्राज्य बना लिया था और खुद को वहां का राजा। अब वो शान से सब पर रौब जमाता और नदी पर राज करने लगा।

 
 

एक किसान नदी के किनारे अपनी खेती करता था । उस किसान के पास एक बैल था जिसने सारा जीवन किसान के लिए कड़ी मेहनत की थी।खेतों में हल चलाने में मदद करना, पुरानी लकड़ी की गाड़ी में जुट किसान की फसलों को बाजार ले जाना। लेकिन अब बैल बूढ़ा हो रहा था।अब उसमें कड़ी मेहनत करने की ताकत नहीं रह गयी थी।

 
 

किसान को अपने बूढ़े बैल से बहुत ही प्यार था और वर्षों से की गयी सेवा के लिए आभारी था। इस लिए एक दिन किसान ने उस बैल से काम करवाना बंद कर दिया। बस अब क्या था, बैल ने सोचा अब तो मजे से सारा दिन नदी किनारे लगी घास खाऊँगा और किसी पेड़ के नीचे बैठ आराम से अपने बुढ़ापे के दिन बिताऊँगा।

 
 

अगले दिन बैल टहलता हुआ नदी किनारे पहुंचा और हरी हरी नरम सी घास चरने लगा। कुछ देर बाद जब पेट भर गया तो नदी से पानी पीकर आराम करने एक पेड़ नीचे चला गया।

 
 

उस बैल को घास खाता देख डर कर छोटी छोटी तितलियों और मधुमक्खियों ने वहां से भाग जाना ही उचित समझा। उसकी लम्बी सी पूँछ, सर पर लगे सींग, विशाल शरीर देख उनका डरना स्वाभाविक था। उन्होंने कभी भी बैल जैसे बड़े प्राणी को नहीं देखा था। उनके लिए तो नदी का मेंढक राजा ही सबसे बड़ा प्राणी था।

 
 

कुछ ही देर में नदी के पूरे प्राणियों में एक विशाल राक्षस के आने की खबर फ़ैल गयी।

आखिर, फैलते फैलते ये बात मेंढक राजा के कान में भी पड़ गयी।

 
 

उसने नदी के सब प्राणियों को बुलाया और पूछा ” क्या बात है जो इतना डर रहे हो।” सबने मिल कर उसे बताया कि एक विशाल प्राणी अब नदी पर रहने आ गया है। इतना बड़ा जो आपने कभी देखा नहीं होगा।” ” उसके सिर पर एक विशाल घुमावदार सींग है और एक पूंछ इतनी लंबी और इतनी मजबूत है कि एक झटके हमें सबको दूर फेकने के लिए पर्याप्त है! “

 
 

मेंढक ने उनके एक शब्द पर भी विश्वास नहीं किया और जोर से हँसते हुए बोला। ” तुम्हारा यह राक्षस मेरे जितना बड़ा नहीं हो सकता। सींग और एक पूंछ वाला मेरी लंबी चिपचिपा जीभ की तुलना में अधिक भयभीत नहीं हो सकता। “

कोई भी प्राणी उससे बड़ा कैसे हो सकता है? क्या वह दुनिया का सबसे बड़ा, सबसे शानदार मेंढक नहीं था?

 
 

तभी नदी के जीवों में भगदड़ मच गयी और सब इधर उधर भागने लगे। मेंढक ने देखा कि एक बूढा बैल नदी से पानी पी रहा था। पानी पीकर बैल कुछ देर बाद वहां से चला गया।

 
 

बैल के जाते ही मेंढक के मन में आया कि कहीं नदी के सारे जीव उससे कम डरने ना लग जाएँ। कहीं उसको राजा समझना न बंद कर दें। बस यही सोच उसने सभी जीवों की एक बैठक बुलाई।

 
 

” अरे, तुम उस बूढ़े बैल को राक्षस समझ वैसे ही डर रहे हो। वो मेरा क्या मुकाबले करेगा।” सब जीवों ने मिल कर कहा ” मेंढक! क्या आपने देखा कि वह कितना बड़ा है? ‘

मेंढक हताश हो गया। ” बड़ा ? आप उस बड़ा कहते हैं? यदि में चाहु तो उससे दुगना बड़ा हो सकता हुँ !”

और मेंढक ने एक गहरी सांस ली और अपना सीना फुला दिया।

” अब बताओ, क्या मैं अब उतना बड़ा नहीं हूँ ?

” अरे नहीं। मेंढक, अभी तक नहीं! ‘ सब एक साथ बोल उठे ” राक्षस आप से बहुत बड़ा दिखता है।”

” ठीक है फिर, मुझे देखो “

 
 

 

अब मेंढक ने पहले से भी ज्यादा गहरी सांस ली, घबराहट और सांस फूलने से आवाज तक नहीं निकल पा रही थी। फिर भी हिम्मत कर पुछा ” अब तो उससे बड़ा होना चाहिए।”

” अभी नहीं, मेंढक। राक्षस बहुत बड़ा है।”

हालांकि, उसकी त्वचा तंग और फैली चुकी थी, बैठना मुश्किल होने लगा था। सांस रोकने की वजह से उसके गाल इतना फूले हुए थे मानो उसकी आंखों को लगभग बंद कर दिया गया था। वह मुश्किल से अपने विशाल पेट को देख सकता था। उसे यकीन था कि वह कम से कम अब तक तो बैल जितना बड़ा हो गया होगा।

 
 

मेंढक को अपनी सामने शर्मिंदगी सी महसूस होने लगी। उसने एक और प्रयास करने का फैसला किया। अपने सबसे बड़े होने के अभिमान पर होती चोट देख उसने एक और गहरी सांस ली।

 
 

जितनी भी हवा वो अपने में भर सकता था उसने भरी। और देखते ही देखते वो बढ़ने लगा। सब हैरान हो उसकी तरफ मुँह खोले देखने लगे।

 

तभी एक एक धमाके की आवाज आयी, धम्म !

मेंढक फट गया था!

 
 

और, अपने पर झूठा अभिमान करने वाले मेंढक ने अपनी जान गवा दी।

 

याद रहे, अभिमानी का अंत बुरा होता है।

 

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