अनोखी प्रतियोगता-Unique Competition

इस साल गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने के लिए स्कूल को अपने छात्रों की एक टुकड़ी भेजनी थी। इस टुकड़ी के लिए छात्रों का चयन और इस परेड को सही ढंग से संचालित करने की लिए प्रिंसिपल साहब ने दो अध्यापक भी नियुक्त किए थे। रोज़ एक घंटे का पीरियड इस मार्च की रिहर्सल के लिए निश्चित था। काफी दिनों से तैयारी चल रही थी और सभी छात्र उत्साह से भाग ले रहे थे। 

राजपथ पर होने वाली इस परेड में शामिल होना गौरव की बात तो है लेकिन इसके लिए शरीर में दम होना चाहिए। इतनी देर तक इस लम्बी परेड में सीधा चलना सबके बस की बात नहीं। काफी मेहनत के बाद दोनों अध्यापकों ने छात्रों का चयन कर लिया। 

छात्रों के चयन के बाद सवाल उठा कि स्कूल की टुकड़ी का नेतृत्व कौन करेगा। ये सबसे मुश्किल भरा होता है क्योंकि नेतृत्व करने वाले लड़के को हाथ में लम्बे और भारी वजन वाले स्कूल का या भारत के झंडे को हाथ में ले कर न सिर्फ चलना होता है बल्कि बाकी छात्रों की तरह एक सिपाही की तरह मार्च भी करना होता है। 

बारी-बारी सब छात्रों के हाथ में झंडा दे कर मार्च करवाया गया। कभी झंडा थोड़ा झुक जाता तो अधयापक डांट देते और दुसरे छात्र ठहाका लगा उस छात्र की खिल्ली उड़ाने लगते। 2 दिन के बाद दोनों अध्यापक इस नतीजे पर पहुंचे कि झंडा तो सिर्फ राहुल या सुरेश के हाथ में ही सुरक्षित रहेगा। सो अब रोज़ एक घंटे की परेड की रिहर्सल में झंडा बारी-बारी से राहुल और सुरेश के हाथ में होता। अध्यापक देखना चाहते थे कि उन दोनों में से ज्यादा दम खम किस में है। 
राहुल तो पढ़ाई लिखाई में तथा खेल कूद में हमेशा ही सर्वप्रथम रहता था। मगर सुरेश दिन भर शरारतें और मौज मस्ती करने को ही अपना जीवन समझता था। जहाँ राहुल एक शांत और सभय स्वभाव वाला था वहीं दूसरी तरफ सुरेश तुनकमिजाज और झगड़ालू मनोवृति रखता था। 
जब भी झंडा राहुल के हाथों में होता तो सुरेश अध्यापकों के पास खड़ा हो कर राहुल की मार्च में गलतियां ही निकालता रहता ताकि अध्यापक राहुल को हटा टुकड़ी का नेतृत्व उसके हाथ में दे दें। मगर दोनों अध्यापक राहुल के मार्च और झंडा सँभालने की तारीफ करते न थकते थे। लेकिन अधयापक सुरेश का दिल भी नहीं तोड़ना चाहते थे सो उसे भी पूरा मौका दे रहे थे। फाइनल चयन को अभी कुछ दिन बाकी थे। 
एक दिन झंडा ले मार्च करते समय राहुल का पैर स्कूल ग्राउंड में पड़े एक पत्थर पर पड़ा और वो लड़खड़ा कर गिरने ही वाला था कि उसने अपने आप को संभाल लिया। वो लड़खड़ाया क्या, बस सुरेश ने एक बवाल सा खड़ा कर दिया। सुरेश इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहता था। 
उसने तुरंत अध्यापकों से अपने नाम की घोषणा करने को कहा। अध्यापकों ने उसे समझाया की स्कूल ग्राउंड में पत्थर की वजह से राहुल लड़खड़ा गया था जबकि राजपथ पर कोई भी पत्थर होने का सवाल ही नहीं उठता। लेकिन सुरेश कहाँ मानने वाला था। उसे तो उस मार्च टुकड़ी का नेतृत्व चाहिए था। 
सुरेश लपक कर प्रिंसिपल के कमरे में पहुंचा और राहुल के लड़खड़ाने की बात बता दोनों अध्यापकों पर पक्षपाती होने का आरोप लगा दिया। प्रिंसिपल महोदय ने दोनों अध्यापकों को बुलाया और सारी बात सुनी। वो समझ गए कि सुरेश के मन में सिर्फ नेतृत्व हथियाने की लालसा है। वह दोनों छात्रों की प्रवर्ति को अच्छी तरह जानते थे। लेकिन सुरेश को सबक सिखाने की लिए उन्होंने एक योजना बनाई। 
प्रिंसिपल साहब ने राहुल और सुरेश के बीच दम-खम और सूझ-बूझ जांचने की एक प्रतियोगता करवाने का फैसला सुनाया। प्रतियोगता ये थी कि दोनों अलग अलग दिशा में पैदल जाएँगे और 3 घंटे पूरा होने पर वापिस लौट आएंगे। दोनों जहाँ से भी लौटने लगेंगे वहां लगे मील के पत्थर (Milestone) की फोटो अपने मोबाइल पर खींचे।  जो सबसे ज्यादा दूरी पूरी करेगा वही टुकड़ी का नेतृत्व करेगा।
अपने को सर्वश्रेष्ठ समझने वाले सुरेश की तो मानो मनचाही इच्छा पूरी हो गयी हो। खुद को राहुल से अधिक ताकतवर और समझदार मान उसने प्रतोयिगता की सब शर्तों को अपने अनुकूल पाया और फ़ौरन तैयारी शुरू कर दी। 
उधर प्रिंसिपल साहब ने प्रतियोगता को कल सुबह 9 बजे शुरू और 12 बजे ख़तम करने का निर्देश दिया। सारा स्कूल इस स्पर्धा को देखने सुबह 9 बजे उमड़ पड़ा। सब चर्चा में जुट गए कि आखिर में कौन विजयी होगा। ज्यादातर छात्रों का मानना था कि सुरेश ही जीतेगा चूँकि वो राहुल से ज्यादा ताकत और दम-खम रखता है। इन्ही अटकलों के के चलते राहुल और सुरेश वहाँ पहुँच गए। 
अपने मोबाइल फोन हाथ में लिए दोनों प्रिंसिपल के इशारे का इंतज़ार कर रहे थे। और जैसे ही प्रिंसिपल साहब ने प्रतियोगता आरम्भ होने का संकेत दिया, दोनों अलग अलग दिशाओं में चल पड़े। प्रतियोगता के नियम के अनुसार दोनों को 12 बजे तक वापिस पहुँचाना था और साथ में लाना था मील पत्थर का फोटो जहाँ से वो वापिस मुड़ते। 
राहुल तो थोड़ा तेज चलने लगा ताकि ज्यादा से ज्यादा दूर जा सके और अपनी योजना के मुताबिक 10.30 बजे तक जहाँ भी पहुंचे वहां मील पत्थर की फोटो खींच वापसी शुरू कर दे। 
लेकिन अपने को होशियार समझने वाला सुरेश तो स्कूल ग्राउंड से बाहर होते ही दौड़ने लगा ताकि ज्यादा से ज्यादा दूर पहुँच अपनी वापसी शुरू कर सके। और हुआ भी वही, अपनी जीत को सुनिक्षित करने की होड़ में में तेजी से दौड़ता हुआ सुरेश राहुल से कई मील आगे निकल गया। 10.30 बजे के करीब उसने मील पत्थर का फोटो खींचा और वापिस चलने लगा। 
राहुल ने भी मील पत्थर का फोटो खींचा और वापसी शुरू कर दी। कभी धीरे तो कभी तेज चलते हुए पूरे 12 बजे वो स्कूल ग्राउंड पर वापिस पहुँच गया। अध्यापकों को मील पत्थर का फोटो दिखाया तो वो सिर्फ 6 मील तक ही जा पाया था। अब सब इंतज़ार में थे कि देखें सुरेश कितने मील तक जा पाया था। इसी दूरी ने ही तो तय करना था कि कौन करेगा नेतृत्व। 
उधर सुरेश को चिंता खाए जा रही थी कि दौड़ते दौड़ते वो 13 मील के पत्थर तक तो पहुँच गया था मगर अब थक चुका था। ज्यादा दूरी तय करने के चक्कर में ये भूल गया कि वापिस भी तो लौटना था। थका हारा धीमे धीमे क़दमों से वो स्कूल की तरफ बढ़ने लगा। लेकिन समय था कि गुजरता ही जा रहा था और अभी भी स्कूल काफी दूर था। आखिर 12.30 बजे वो स्कूल ग्राउंड में दाखिल हुआ तो सामने खड़े राहुल को देख उसे लगा जैसे राहुल भी अभी ही वापिस आया हो। 
अपने मील पत्थर का फोटो सबको दिखा पुछा कि राहुल कितने मील तय कर पाया। जब उसे पता चला कि राहुल तो सिर्फ 6 मील तक ही जा कर लौट आया तो उसे अपने 13 मील जाने पर गर्व होने लगा। 
प्रिंसिपल साहब ने जब उसकी पीठ को थपथपाया तो उसे लगा मानो उसने यह प्रतियोगता जीत ली हो। लेकिन तभी प्रिंसिपल साहब ने राहुल को बुला उसके नेतृत्व की घोषणा कर सुरेश की सब उम्मीदों पर पानी फेर दिया। 
प्रिंसिपल साहब का कहना था कि सुरेश ने जरूर ज्यादा दूर जा कर कमाल किया है लेकिन प्रतियोगता के नियमों अनुसार वो समय पर वापिस नहीं लौटा। इस लिए राहुल को इस प्रतियोगता का विजेता माना जायेगा। 
तभी कहते हैं कि चाहे कोई प्रतियोगता हो या संसार का कोई दूसरा कार्य,
हमें नियमों का पालन करना चाहिए। 

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