अनुच्छेद लेखन-नर हो न निराश करो मन को-Anuched Lekhan

‘ नर हो न निराश करो मन को ‘ पर अनुच्छेद 
रुपरेखा : मनुष्य ही समर्थ प्राणी है – सफलता पाने की क्षमता – निराशा दुर्बलता की निशानी – कार्य                शैली और विचारों में बदलाव 
संसार में मनुष्य ही सबसे समर्थ प्राणी है, और सब कुछ पाने की क्षमता रखता है। यदि वह किसी कारणवश निराशा में डूब जाता है, तब उसके सोचने-समझने की शक्ति भी धीमी पड़ जाती है। सफलता-विफलता तो जीवन के दो बिंदु है, लेकिन निराशा के कारण विफलताओं को आधार मान मनुष्य हीनता और दुर्बलता का शिकार हो जाता है। निराश होकर बैठे रहने से अच्छा हो अगर वह अपनी शक्ति का उपयोग सकारात्मक तरीके से कर अपनी असफलता को सफलता में बदल दे। दृढ़ विश्वास और इच्छाशक्ति के बल पर तो लोग हिमालय पर भी विजय प्राप्त कर चुके है, घने जंगलों को साफ़ कर बस्तियां बसा चुके हैं। न जाने कितनी असफलताओं के बाद इंसान को चाँद तक पहुंचने में सफलता मिल चुकी है। तो फिर हम क्यों निराशा के शिकार हो आलसी और निकम्मे बनकर अपने और समाज पर बोझ बने। क्यों न हम निराशा की इस धुंधली परत को अपने मन से निकाल फेंकें और एक नयी शुरुआत करें। अपने विचार, धारणा और कार्य शैली में बदलाव कर क्यों न हम हिम्मत का परिचय देते हुए अपनी विफलताओं को सफलता में परिवर्तित कर दें। 

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